यजुर्वेद सिंह ठाकुर 
कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर ब्लॉक के छोटे से गांव सबलपुर में 85 वर्षीय मोहम्मद अब्दुल नईम का जीवन अब केवल आहों और आंसुओं का दस्तावेज बनकर रह गया है। उम्र के इस पड़ाव पर, जब उन्हें सम्मान और सहारा मिलना चाहिए था, वे खुद को समाज से बहिष्कृत और भय के साए में जीते हुए पाते हैं।
नईम साहब, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समाज की भलाई के लिए कुर्बान कर दी, आज उसी समाज में अपनों के बीच पराया महसूस कर रहे हैं। उन्होंने गांव के मंदिर, तालाब और गौठान के लिए अपनी जमीन दान की। उन्होंने मस्जिद, मदरसे और कब्रिस्तान के लिए भी अपनी जमीन दे दी, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान को याद करें। लेकिन आज वही मोहम्मद नईम एक अंधेरे कोने में बैठकर यह सोचने पर मजबूर हैं कि क्या उनका जीवन इसी अंजाम के लिए था।
साजिश का शिकार और बहिष्कार का दर्द
नईम साहब के अनुसार, मुस्लिम जमात के सदर और उनके समर्थक—शेख मसूद, शेख माजिद, शेख मंसूर और अन्य—ने साजिश रचकर उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया है। इन लोगों ने न सिर्फ उनके परिवार को समाज से अलग-थलग कर दिया, बल्कि उनके परिचितों और अन्य लोगों को भी धमकी दी कि वे उनसे किसी भी प्रकार का संबंध न रखें। नईम साहब की आंखों में आंसू छलक पड़ते हैं, जब वे कहते हैं, “मैंने तो सिर्फ सबके भले की कोशिश की। लेकिन आज मेरे अपने ही मुझे अपराधी की तरह देख रहे हैं।”
कब्रिस्तान में दफनाने तक की मनाही
नईम साहब के दिल को सबसे ज्यादा चोट तब लगी जब उन्होंने सुना कि उनके परिवार को गांव के कब्रिस्तान में दफनाने तक की इजाजत नहीं दी जाएगी। “क्या मौत के बाद भी इंसान का अपमान होता है?” वे गहरे दर्द से कहते हैं। उन्हें किसी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम में शामिल होने की भी मनाही कर दी गई है। यह न केवल उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है, बल्कि उनकी इंसानी गरिमा पर सीधा प्रहार है।
डर और असुरक्षा में जी रहा परिवार
नईम साहब का परिवार आज खौफ और असुरक्षा के माहौल में जी रहा है। उन्होंने बताया कि जिन तेरह लोगों ने यह अन्याय किया है, उनके खिलाफ पहले भी कई मामले दर्ज हो चुके हैं। लेकिन कानून के प्रति उनकी अनदेखी और दबंगई जस की तस जारी है। “मेरे बच्चे मुझसे पूछते हैं, ‘अब्बा, हमने क्या गलत किया?’ लेकिन मेरे पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं है,” नईम साहब का गला भर आता है।
जिला प्रशासन से गुहार
नईम साहब ने जिला प्रशासन और समाज से अपील की है कि उन्हें और उनके परिवार को इस अन्याय और अपमान से मुक्त कराया जाए। “मुझे इंसाफ चाहिए। मैं चाहता हूं कि मेरे परिवार को सुरक्षा मिले और इन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। मेरी बस यही आखिरी ख्वाहिश है,” वे भावुक होकर कहते हैं।
यह समाज का आईना है
यह कहानी सिर्फ नईम साहब की नहीं है; यह उस समाज का आईना है, जहां एक व्यक्ति जिसने अपना पूरा जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया, उसे आखिर में अपमान और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। क्या नईम साहब को न्याय मिलेगा? या उनके आंसू और पुकारें कहीं अंधेरे में खो जाएंगी? इसका जवाब न केवल प्रशासन को, बल्कि पूरे समाज को देना होगा।
अब यह सवाल हम सबके लिए है: क्या इंसानियत इतनी कमजोर हो गई है कि एक बुजुर्ग के आंसुओं का बोझ भी नहीं उठा सकती?
