दीपक विश्वकर्मा
निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया गया केंद्रीय बजट 2026–27 मौजूदा दौर की चुनौतियों के सामने बेमतलब और दिशाहीन नज़र आती है। इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 खुद मानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक अहम मोड़ पर पहुँच गई है, वैश्विक माहौल में बेहद तेज़ भूराजनीतिक बदलाव हो रहे हैं जो आने वाले सालों में निवेश, सप्लाई चेन और विकास की संभावनाओं पर असर डालेंगे। बजट न तो इन मुख्य चुनौतियों पर ध्यान देता है और न ही भारत को उथल-पुथल भरी वैश्विक स्थिति के लिए तैयार करने के लिए कोई ठोस नीतिगत बदलाव पेश करता है।
जैसा कि CITU और अन्य केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों ने लगातार चेतावनी दी है, इकोनॉमिक सर्वे और बजट दोनों ही वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था के संकट का बोझ मज़दूर वर्ग और आम जनता पर डालकर, इसे संभालने की कोशिश करते हैं। इसका तथाकथित सुधार एजेंडा मज़दूर-विरोधी लेबर कोड कानूनों के नोटिफिकेशन और क्वालिटी कंट्रोल के नियामक को कमज़ोर करने पर ही केंद्रित है, जिससे मज़दूरों के अधिकार और घरेलू उद्योग को नुकसान हो रहा है। बजट भाषण “युवा शक्ति” पर बयानबाज़ी से शुरू हुआ, लेकिन 2047 तक के लक्ष्य के साथ एक हाई-पावर्ड “एजुकेशन टू एम्प्लॉयमेंट एंड एंटरप्राइज” स्टैंडिंग कमेटी के प्रस्ताव के साथ खत्म हुआ। भारत के युवाओं को अभी अच्छा और सुरक्षित रोज़गार की जरूरत है, न कि दूर भविष्य के सब्ज़ बाग के सपनों की!
वित्त मंत्री का रिकॉर्ड लगातार नौवां बजट एक संख्यात्मक दिखावा है जो गहरी मुश्किल में फंसी अर्थव्यवस्था को छिपाने के भरसक प्रयास करता है। 4.3 प्रतिशत वित्तीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) के लक्ष्य और कर्ज़- जीडीपी अनुपात को 55.6 परसेंट तक कम करने की कोशिश में, सरकार ने भूख और बेरोज़गारी की दबाव वाली सच्चाइयों को मैक्रो-फिस्कल रंगीन तस्वीरों से ढकने की कोशिश की है। यह एक निचोड़ने वाला बजट है जो गरीबों के हाथों से पैसों की उपलब्धता छीनने का काम करता है। कुल ₹53.5 लाख करोड़ के खर्च के बावजूद, असली तस्वीर सामाजिक समर्थन में व्यवस्थित कटौती ही दिखाती है।
बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वाले कॉर्पोरेट्स पर टैक्स लगाकर राजस्व बढ़ाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की जा रही है। इसके बजाय, 2026-27 में गैर-टैक्स राजस्व में 12.49 प्रतिशत की बढ़ोतरी मुख्य रूप से PSUs से मिलने वाले डिविडेंड में 16.9 प्रतिशत की अनुमानित बढ़ोतरी की वजह से है। यह असल में PSUs को निचोड़ रहा है और जनता की संपत्ति को मज़बूत करने के बजाय उन्हें निजी कॉरपोरेटों के साथ प्रतियोगिता में धकेल रहा है। गैर-टैक्स राजस्व पर बढ़ती निर्भरता आखिरकार जनता पर बोझ और दबाव बढ़ाने का ही काम करेगी। 2025-26 और 2026-27 के बजटीय अनुमानों में बाहरी अंशदान में 49.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी वित्तीय स्वायत्तता, वहनीयता और बाहरी दबावों के असर को लेकर चिंता पैदा करती है। कर्ज़ चुकाने और ब्याज की देनदारियों का बढ़ता बोझ विकास और कल्याण से जुड़े बजटीय आवंटन में भारी कटौती करने पर मजबूर कर रहा है, जो कि इस बजट में भी साफ तौर पर दिख रहा है।
यह बजट अरबपतियों के लिए एक खुला तोहफ़ा है। मिनिमम अल्टरनेट टैक्स (MAT) को 15 प्रतिशत से घटाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया है, कॉर्पोरेट सेफ-हार्बर प्रोविज़न को बढ़ाया गया है, और एडवांस्ड प्राइसिंग एग्रीमेंट (APA) की टाइमलाइन को घटाकर दो साल कर दिया गया है, जिससे मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन्स की जांच आसान हो गई है। इस बीच, आम लोगों पर प्रतिगामी GST और व्यक्तिगत आयकर की वजह से ₹28.7 लाख करोड़ का कुल टैक्स का बोझ है। पहली बार, कुल जमा व्यक्तिगत आयकर (₹14.66 लाख करोड़) कुल जमा कॉर्पोरेट टैक्स (₹12.31 लाख करोड़) से ज़्यादा है।
पूंजीपतियों को दी जा रही अन्य रियायतों में शामिल बॉन्डेड ज़ोन में टोल मैन्युफैक्चरर्स को कैपिटल गुड्स सप्लाई करने वाले अप्रवासी भारतीयों के लिए पांच साल की कर माफी और निजी उत्पादकों के लिए हवाईजहाज पार्ट्स और ज़रूरी मेडिकल कंपोनेंट्स के लिए कच्चे माल पर कस्टम ड्यूटी में छूट शामिल है। यह सब और कुछ नहीं बल्कि मुनाफ़ों का निजीकरण करते हुए खतरों का सामाजिकरण करना। बजट ने व्यापार में सुगमता की आड़ में टैक्स चोरों और कॉर्पोरेट्स के लिए उनके अपराधों पर पर्दा डालने की प्रकिया को और आगे बढ़ाया है।
80,000 करोड़ के विनिवेश का लक्ष्य और व्यक्तिगत इस्तेमाल के सामान पर इंपोर्ट ड्यूटी 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने से “ईज़ ऑफ़ लिविंग” (आसान ज़िंदगी) का छलावापूर्ण नारा उछाला गया है। जबकि फ्लैगशिप प्रोग्राम, PM विश्वकर्मा योजना, में आवंटन कम किया गया है—2024-25 के असल में 3,993 करोड़ से घटाकर 3,891 करोड़ कर दिया गया है।
बजट इंसेंटिव के लिए आवंटन को और बढ़ाकर कॉरपोरेटों सेवा करता है। 40,000 करोड़ के खर्च के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग सब्सिडी 2.0, 2035 तक न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट के लिए इंपोर्ट पर कस्टम ड्यूटी में छूट, और 2047 तक डेटा सेंटर में निवेश करने वाली विदेशी कंपनियों के लिए कर माफी आदि सरकार की कॉर्पोरेट-समर्थक प्राथमिकताओं को साफ तौर पर दिखाते हैं।
रेलवे में जिस तरह का आवंटन किया गया है वह संभ्रांतों के हितों को ही बढ़ावा देता है। मुंबई-पुणे और हैदराबाद-चेन्नई जैसे सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर में संसाधन डाले जा रहे हैं, जबकि आम यात्रियों को भीड़भाड़ वाले कोच झेलने पड़ रहे हैं और वरिष्ठ नागरिकों से छीनी गई छूट अब भी वापस नहीं की गई है। निजी सेवा दाताओं के लिए टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर आवंटन ₹9,650 करोड़ से बढ़कर ₹24,000 करोड़ हो गया है, जिससे सीधे निजी कंपनियों को सब्सिडी मिल रही है। AI और इनोवेशन पर बड़े-बड़े दावों के बावजूद, भारत के AI मिशन के लिए आवंटन ₹2,000 करोड़ से घटाकर ₹1,000 करोड़ कर दिया गया है।
बढ़े हुए कैपिटल खर्च को InvITs, REITs, NIIF, NaBFID, और प्रस्तावित पब्लिक-एसेट-स्पेसिफिक REITs के ज़रिए संसाधनों के आक्रामक मोनेटाइजेशन (वित्तीयकरण) और निजीकरण के ज़रिए वित्त पोषित किया जा रहा है। यह दो-तरफ़ा रणनीति दिखाता है: वित्तीय घाटे (फिस्कल गैप) को भरने के लिए PSUs से ज़्यादा डिविडेंड निकालना और मुनाफ़े के लिए जनता की संपदाओं को निजी कॉर्पोरेट्स के हाथों में सौंपना।
जबकि रक्षा, मेट्रो, मैरीटाइम सेक्टर और रेलवे में इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ा है, रेलवे एसेट्स की बढ़ती लीजिंग और अधिक मोनेटाइजेशन का संकेत देती है। ₹7,280 करोड़ की मैग्नेट स्कीम के तहत ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में प्रस्तावित रेयर अर्थ कॉरिडोर आदिवासी समुदायों के विस्थापन और पर्यावरण के विनाश का खतरा पैदा करते हैं। पांच सालों में ₹10 लाख करोड़ का एसेट-रीसाइक्लिंग रोडमैप CPSE की ज़मीन और इंफ्रास्ट्रक्चर की बेहद तेज़ बिक्री है। स्वास्थ्य के लिए सिर्फ़ ₹1.01 लाख करोड़ का आवंटन किया गया है, जो कुल खर्च का सिर्फ़ 1.96 परसेंट है, जबकि बड़ी फार्मा कंपनियों को अंशदान के तौर पर ₹10,000 करोड़ की “बायोफार्मा शक्ति” बनाई गई है।
हालांकि बजट को MSMEs का समर्थन करने के लिए एक बड़ी पहल के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन असल में, MSMEs के लिए बजट में जो बढ़ोतरी हुई है, वह सिर्फ़ उन कामों पर ही केंद्रित लगती है जो ज़्यादातर उत्पादन के निचले लेवल पर हैं। दूसरी ओर, सरकार ने SEZ यूनिट्स को घरेलू टैरिफ क्षेत्र में रियायती ड्यूटी पर बेचने की इजाज़त दी है, जिससे घरेलू कंपनियों को नुकसान होना तय है। इससे पता चलता है कि पूंजी को खतरे से बचाने और मज़दूर वर्ग को असुरक्षित छोड़ने की लगातार अपनाई जा रही है नीति को हो आगे ले जाया जा रहा है।
PMKSY, RKVY, PM-किसान और फसल बीमा जैसी खेती से जुड़ी स्कीमों में महंगाई को एडजस्ट करने के बाद कोई असली बढ़ोतरी नहीं दिख रही है, जबकि खेती का संकट गहरा रहा है। खाद के आवंटन में 8.4 प्रतिशत की कटौती की गई है, जबकि खाद्य सब्सिडी का आवंटन स्थिर है। इसलिए खेती की पैदावार बढ़ाने के दावे गुमराह करने वाले हैं। बेसिक सर्विस स्कीम के लिए आवंटन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, जिससे न तो सेवा में सुधार की कोई गुंजाइश है और न ही स्कीम वर्कर्स के वेतन और कार्यस्थिति में।
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, उत्तर-पूर्व के इलाके, खेती, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के लिए आवंटन में कटौती की गई है। जेंडर बजट में ₹51,144 करोड़ की कटौती की गई है। शहरी आर्थिक इलाकों को बढ़ावा देने के दावों के बावजूद शहरी विकास एलोकेशन में 13.16 प्रतिशत की गिरावट आई है।
हालांकि ऊर्जा और परमाणु शोध के लिए आवंटन बढ़ा है, लेकिन इनका मकसद साफ तौर पर सरकारी शोध को मजबूत करने के बजाय निजी प्रवेश को आसान बनाना है और इस नीति के केंद्र में न्यूक्लियर पावर में निजी सेक्टर का प्रवेश है। RDI और BIO-RIDE के तहत ज़्यादा R&D खर्च के बावजूद, पब्लिक सेक्टर उत्पादन, सोलर पावर और PSU निवेश के लिए आवंटन कम हो गया है या रुक गया है। वहीं दूसरी ओर KUSUM और PM सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना जैसी स्कीम में कई गुना बढ़ोतरी हुई है, जो निजी पूंजी को अप्रत्यक्ष सब्सिडी देने का संकेत है।
औपचारिक क्षेत्र में रोज़गार में ठहराव ने लाखों लोगों को असुरक्षित गिग वर्क में धकेल दिया है। इकोनॉमिक सर्वे में बार-बार ज़िक्र के बावजूद, बजट में गिग वर्कर्स के कल्याण के लिए कोई आवंटन नहीं है और यह बजट मौजूदा वादों को भी पूरा करने में नाकाम रहा है, कानूनी पहचान देना तो दूर की बात है! इसी तरह, असंगठित मज़दूरों के दूसरे हिस्सों के लिए कोई बजटीय आवंटन नहीं किया गया है।
एक ऐसे समय में जब भारतीय मज़दूर आर्थिक उथल-पुथल के बीच ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब यह बजट पूरी तरह से एक जन-विरोधी और मज़दूर-वर्ग-विरोधी बजट है। बजट जनता के हितों के साथ धोखा करते हुए निजी कॉर्पोरेट्स की झोली भरता है। यह बजट असल में विकास को पीछे ले जा रहा है और पहले से मौजूद भयानक असमानता के माहौल में बराबरी की ओर वितरण की संभावनाओं को और खराब कर रहा है।
CITU इस मज़दूर-विरोधी, कॉर्पोरेट-समर्थक बजट को पूरी तरह से खारिज करता है और भारत के मेहनतकशों से इन नीतियों के खिलाफ एकजुट विरोध को तेज़ करने, सड़कों पर आने और 12 फरवरी की आम हड़ताल की ओर आगे बढ़ने की अपील करता है।

Leave a Reply