बस्तर में पीलिया का प्रकोप: अस्पताल नहीं, सरपंच के घर उमड़ रही है मरीजों की भीड़ आडावाल में आस्था और ‘माला’ के सहारे इलाज; ओडिशा तक से पहुँच रहे लोग

चंद्रहास वैष्णव

जगदलपुर |
बस्तर संभाग में इन दिनों पीलिया (जॉन्डिस) ने अपने पैर पसार लिए हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस साल मरीजों की संख्या में भारी इजाफा दर्ज किया गया है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी बस्तर के ग्रामीण इलाकों में आज भी पारंपरिक और देसी पद्धतियों पर विश्वास कायम है। इसका जीवंत उदाहरण जगदलपुर से सटे आड़ावाल ग्राम में देखने को मिल रहा है, जहाँ सरपंच के घर के बाहर लगी भीड़ विकास कार्यों के लिए नहीं, बल्कि पीलिया से मुक्ति पाने की आस में जुटी है।

*सरपंच की ‘दैवीय माला’ पर अटूट विश्वास*
आड़ावाल की सरपंच जयंती कश्यप पिछले कई वर्षों से पीलिया का देसी तरीके से इलाज कर रही हैं। यहाँ इलाज का मुख्य आधार एक विशेष ‘माला’ और पूजा-पाठ है। हालांकि, यह माला किस पेड़ के तने या जड़ी-बूटी से तैयार की जाती है, इसे गोपनीय रखा गया है, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।

*सरपंच जयंती कश्यप के अनुसार:*
“हम सालों से पूजा-पाठ और पारंपरिक विधि से सेवा कर रहे हैं। यहाँ आने वाले मरीजों को खान-पान का विशेष परहेज करना होता है। यदि बीमारी शुरुआती है, तो 3-4 दिन में असर दिखने लगता है और गंभीर स्थिति में 10 दिनों के भीतर पीलिया काफी हद तक खत्म हो जाता है।”

*सरहदों के पार तक पहुँच रही ख्याति*
आड़ावाल में इलाज के लिए केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में मरीज पहुँच रहे हैं। प्रतिदिन यहाँ 50 से 60 लोग इलाज की उम्मीद में जुट रहे हैं।

• केस 1: ओडिशा के कोसागुमड़ा से आए नरेंद्र ने बताया कि उनके भाई दया का इलाज पहले यहीं हुआ था, जिससे मिले लाभ के कारण वे दोबारा यहाँ आए हैं।

• केस 2: जगदलपुर सन सिटी निवासी दीपक मांडवी ने साझा किया कि उन्होंने अपनी बच्ची का इलाज 6 साल पहले यहीं कराया था। बेहतर परिणाम (Result) को देखते हुए वे आज भी इसी पद्धति पर भरोसा करते हैं।

• केस 3: पुष्पाल ग्राम के लखीराम के मुताबिक, उनकी पत्नी हेमवती का पीलिया यहाँ आने के मात्र 4-5 दिनों में 80 प्रतिशत तक ठीक हो गया।

*आधुनिक और पारंपरिक चिकित्सा का संगम*
बस्तर एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ आज भी ‘बैगा-गुनिया’ और पारंपरिक रीतियों का गहरा प्रभाव है। राहत की बात यह है कि यहाँ आने वाले मरीजों को आधुनिक दवाओं से परहेज करने के लिए नहीं कहा जाता। सरपंच का कहना है कि लोग देसी इलाज के साथ-साथ अस्पतालों की दवाइयां भी जारी रख सकते हैं।

*सावधानी और परहेज अनिवार्य*
इस देसी उपचार में खान-पान पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है। पीलिया की गंभीरता को देखते हुए मरीजों को तेल-मसाले से दूर रहने और सात्विक आहार लेने की सलाह दी जाती है। जहाँ एक ओर स्वास्थ्य विभाग पीलिया को लेकर अलर्ट पर है, वहीं दूसरी ओर आदावल की यह भीड़ बस्तर की संस्कृति और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की गहरी जड़ों को दर्शाती है।