यजुवेन्द्र सिंह ठाकुर
कांकेर।
रामकथा के अंतिम दिन कथा सुबह 11 बजे शुरू हुई। पंडित अतुलकृष्ण भारद्वाज का स्वागत सांसद मोहन मंडावी ने किया। कथा सुनाते अतुलकृष्ण ने कहा जब तक देश में संस्कृत तथा हिंदी का वर्चस्व था यहां की हवा तथा जल भी स्वच्छ थे। अंग्रेजी भाषा ने भारत की सभ्यता को नुकसान पहुंचाया ही है यहां के वातावरण को भी प्रदूषित किया है। अतुलकृष्ण जी ने कहा आज कांकेर से बहने वाली दुधनदी में बहुत कम पानी रह गया है। इसके पीछे कारण है की जंगलों का विनाश हो रहा है। बस्तर के जंगल ही यहां का आधार हैं। जितना तेजी से जंगलों का विनाश रोक संरक्षण किया जाएगा उतनी तेजी से प्रदूषण दूर होगा। इसलिए अधिक से अधिक पेड़ लगाएं क्योंकि पेड़ ही जलसंरक्षण का सबसे बड़ा साधन है। अतुलकृष्ण जी ने सूर्पणखा प्रसंग सुनाते वेलेंटाईन डे पर कड़ा प्रहार करते कहा यह हमारी संस्कृति नहीं है। यह पश्चिमी सभ्यता है। हम लोग मर्यादा पुरषोत्तम राम के वंशज हैं जबकि वेलेंटाईन डे अमर्यादित सभ्यता है। इससे हमें दूर रहने की आवश्यक्ता है।
रामकथा के अंतिम दिन कथा शुरू ही होने वाली थी की अचानक पंडाल के अंदर एक बंदर पहुंच गया। बंदर मंच के बिल्कुल करीब पहुंचकर बैठा रहा। बंदर के पंडाल में पहुंचने पर कथावाचक अतुलकृष्ण भारद्वाज ने कहा आज मंगलवार है तथा बजरंग बली का दिन है। कथा शुरू होने से पहले हनुमान चालीसा का पाठ कराया गया। कुछ देर बाद बंदर पंडाल से बाहर चला गया।
अंतिम दिन की गई महाआरती
रामकथा के अंतिम दिन पंडित अतुलकृष्ण ने कांकेर के मंदिरों में होने वाली सामूहिक महाआरती परंपरा की प्रशंसा करते कहा इस तरह के आयोजन पुरे देश में होना चाहिए। कथा के समापन पर 108 दीपों वाली महाआरती की गई। रामकथा के अंतिम दिन आयोजन समिती द्वारा भंडारा का आयोजन किया गया था। भंडारा में तीन हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने भोजन ग्रहण किया। कथा समाप्त होने के बाद कथा वाचक अतुल कृष्ण भारद्वाज को विदाई दी गई।
