चंद्रहास वैष्णव 
जगदलपुर “RTI में खर्च की राशि सामने आई, लेकिन मौके पर काम का अपेक्षित असर नहीं दिखने का दावा; विपक्ष बोला- पहले पुराने काम का हिसाब दें, फिर नई राशि खर्च करें”
ऐतिहासिक दलपत सागर के संरक्षण और सौंदर्यीकरण पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। करीब ₹9.88 करोड़ की नई परियोजना शुरू होने से पहले नगर निगम का हाईकोर्ट में कैविएट दाखिल करना अब चर्चा का विषय बन गया है। दूसरी ओर, RTI से मिली जानकारी के अनुसार ₹8.77 लाख खर्च होने के बावजूद संबंधित काम का अपेक्षित परिणाम जमीन पर दिखाई नहीं देने का दावा सामने आया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पुराने कामों के परिणाम और खर्च को लेकर ही सवाल बाकी हैं, तो नई बड़ी परियोजना से पहले उनका स्वतंत्र मूल्यांकन क्यों नहीं कराया गया?
दलपत सागर की सफाई, गहरीकरण और सौंदर्यीकरण पर पिछले वर्षों में अलग-अलग मदों से राशि खर्च होती रही है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक करीब 15 वर्षों में 13 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जाने का दावा है, इसके बावजूद जलकुंभी की समस्या बनी हुई है।
##₹8.77 लाख खर्च, फिर जमीन पर काम कहां?##
RTI से मिली जानकारी में सामने आए ₹8.77 लाख के खर्च को लेकर अब दस्तावेजी पड़ताल का सवाल उठ रहा है। यदि राशि खर्च हुई है तो किस काम पर, किस एजेंसी ने काम किया, उसका माप पुस्तिका में क्या उल्लेख है, भुगतान किस आधार पर हुआ और काम पूरा होने के बाद उसका सत्यापन किस अधिकारी ने किया—इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ रही है।
विपक्ष इसी बिंदु को लेकर नगर निगम पर निशाना साध रहा है। कांग्रेस नेता सुशील मौर्य ने हाल में 9.88 करोड़ रुपए के कार्यों का पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक करने की मांग की थी। विपक्ष का कहना है कि जनता को यह बताया जाना चाहिए कि स्वीकृत राशि में से कितना पैसा खर्च हुआ और वर्तमान में कितना उपलब्ध है।
##कैविएट से उठे सवाल: कानूनी सुरक्षा या पारदर्शिता की जरूरत?##
नगर निगम द्वारा कैविएट दाखिल करने का सामान्य कानूनी उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना के खिलाफ कोई याचिका आने पर अदालत निगम का पक्ष सुने बिना एकतरफा अंतरिम आदेश न दे। इसे अपने आप में किसी अनियमितता या पर्दा डालने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
लेकिन इसी कदम ने राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। विपक्ष का सवाल है कि यदि परियोजना पूरी तरह जनहित में है और पुराने कार्यों का रिकॉर्ड साफ है, तो निगम को खर्च, कार्य की प्रगति और पुराने परिणामों का पूरा विवरण सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है? दूसरी ओर, कैविएट को निगम की ओर से संभावित न्यायिक चुनौती से पहले कानूनी प्रक्रिया में अपना पक्ष सुरक्षित रखने की कार्रवाई के रूप में भी देखा जा सकता है।
##नई योजना में फिर बड़ा खर्च, पहले पुराने काम की जांच क्यों नहीं?##
नई परियोजना में करीब 2.7 किलोमीटर क्षेत्र में पाथवे-पेवमेंट, टो-वॉल, चौपाटी, पौधरोपण, लाइटिंग और सीवरेज डिस्चार्ज रोकने जैसे कार्य प्रस्तावित हैं। हालिया रिपोर्ट में ₹9.88 करोड़ की स्वीकृति और जलकुंभी हटाने के लिए NMDC से करीब ₹50 लाख की सहायता का भी उल्लेख है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नई राशि खर्च करने से पहले पिछले कामों का स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन होगा? खासकर ₹8.77 लाख के खर्च के बाद जमीन पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिखने के दावे की जांच होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कमी योजना में थी, क्रियान्वयन में या रखरखाव में।
##विपक्ष के सवाल सीधे जनता से जुड़े##
विपक्ष का कहना है कि दलपत सागर शहर की पहचान है और इसके नाम पर खर्च होने वाली प्रत्येक राशि का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। कांग्रेस ने महापौर से ₹9.88 करोड़ की स्वीकृत राशि, खर्च, एजेंसी, कार्य की वर्तमान स्थिति और निगरानी व्यवस्था की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
##अब इन दस्तावेजों पर नजर##
RTI के जरिए पुराने कार्यों के वर्क ऑर्डर, भुगतान विवरण, माप पुस्तिका, पूर्णता प्रमाण-पत्र और ऑडिट रिपोर्ट सामने आने पर तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी। खासतौर पर ₹8.77 लाख के खर्च के बाद मौके पर क्या काम हुआ और उसका सत्यापन कैसे हुआ, यह रिकॉर्ड इस पूरे विवाद में महत्वपूर्ण होगा। साथ ही यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि कैविएट के पीछे केवल कानूनी एहतियात है या परियोजना को लेकर किसी संभावित न्यायिक चुनौती की आशंका।
