बच्चों की जान खतरे में, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा आश्रम 20 लाख की मरम्मत सिर्फ कागज़ों में, जामगांव 100 सीटर बालक आश्रम बना मौत का इंतज़ार करता भवन

चंद्रहास वैष्णव

एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें आदिवासी बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और बेहतर भविष्य के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर जिम्मेदार अफसर और ठेकेदार इन योजनाओं को खुला लूट का जरिया बना चुके हैं। आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित 100 सीटर शासकीय बालक आश्रम, जामगांव (विकासखंड बास्तानार) में हुए मरम्मत एवं उन्नयन कार्य ने सरकारी दावों की पूरी तरह पोल खोल दी है। यहां बच्चों की जान खतरे में है और भ्रष्ट तंत्र बेखौफ मलाई खा रहा है।

आश्रम शाला भवन की मरम्मत और उन्नयन के लिए लगभग 20 लाख रुपये स्वीकृत किए गए, जिनमें से करीब 15 लाख रुपये का भुगतान ठेकेदार को कर दिया गया। लेकिन मौके पर स्थिति यह है कि काम नाममात्र का और गुणवत्ता बेहद घटिया है। छह माह पहले की गई पुट्टी–पुताई अब दीवारों और छत से उखड़ रही है। कई जगह छत का प्लास्टर गिर चुका है, सरिया बाहर दिखाई दे रही है और छत फूल चुकी है। किसी भी वक्त बड़ा हादसा हो सकता है, लेकिन जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे हैं।

मरम्मत के नाम पर टूटे-फूटे खिड़की और दरवाजों के सुधार का भी प्रावधान था, लेकिन यह कार्य कहीं दिखाई नहीं देता। सबसे गंभीर मामला टाइल्स कार्य का है। लगभग 6 लाख रुपये का भुगतान चार माह पहले कर दिया गया, जबकि पूरे आश्रम भवन में टाइल्स लगाने का एक भी प्रमाण मौके पर नहीं मिला। साफ है कि रकम उठा ली गई और काम गायब कर दिया गया।

ग्राम पंचायत जामगांव के सरपंच बामन गावड़े ने गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि कार्य स्वीकृति के बाद ठेकेदार ने दबाव बनाकर काम अपने हाथ में लिया और अधिकारियों के कहने पर भुगतान कराया गया। भुगतान से इनकार करने पर अनावश्यक दबाव बनाया गया। यह बयान सीधे तौर पर विभागीय मिलीभगत और संरक्षण की ओर इशारा करता है।

जब इस मामले में एसडीओ श्री हरिश साहू से पक्ष जानना चाहा गया, तो उन्होंने किसी भी दबाव से इनकार करते हुए जिम्मेदारी दूसरे अधिकारियों पर डाल दी। यानी हर कोई पल्ला झाड़ रहा है, लेकिन बच्चों की जान के खतरे पर कोई जवाबदेह नहीं है।

सवाल साफ है—
क्या आदिम जाति कल्याण विभाग और जिला प्रशासन इस गंभीर लापरवाही और भ्रष्टाचार पर दोषी अफसरों व ठेकेदारों पर कड़ी कार्रवाई करेगा? या फिर हमेशा की तरह यह मामला भी दबा दिया जाएगा और किसी दिन किसी हादसे के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी? फिलहाल सच यही है कि जामगांव का यह बालक आश्रम बच्चों के भविष्य का नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुका है।

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