विनोद जैन 
बालोद। समता भवन बालोद में चातुर्मास के दौरान जैन संत शासन दीपक श्री अक्षयमुनिजी मसा ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज मनुष्य जीवन जी तो रहा है, लेकिन कई बार जीवन औपचारिकता बनकर रह जाता है। परिवार में शांति हो तो जीवन का आनंद मिलता है, वहीं विचारों में मतभेद होने पर परिवार में तनाव बढ़ता है। उन्होंने कहा कि “पहले रसोई घर में रस भरा भोजन मिलता था, अब रसोई घर किचन हो गया तो किच-किच शुरू हो गई।”
उन्होंने कहा कि जीवन को सही ढंग से जीने के लिए धर्म का गहरा बोध जरूरी है। परिवार में खटपट की स्थिति में मौन धारण करना बेहतर है। उन्होंने मैत्री, प्रमोद, करुणा और मध्यस्थता को जीवन की महत्वपूर्ण भावनाएं बताते हुए अहंकार से दूर रहने, दान-पुण्य और सेवा की भावना रखने का आह्वान किया।
श्री अक्षयमुनिजी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सीखना भी होना चाहिए। व्यक्ति को हमेशा परोपकार की भावना रखनी चाहिए और समाज में साधु-संतों के योगदान को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान जीवन पूर्व जन्म के पुण्य से मिला है, इसलिए इस जीवन में भी पुण्य कर्म और सेवा कार्य करते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि “मेरी खुशियां मेरी इजाजत के बिना कोई नहीं छीन सकता।” व्यक्ति को विचारों के बजाय आत्मिक चेतना के साथ जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए।
छह श्राविकाओं ने लिया उपवास तपस्या का संकल्प
चातुर्मास में धर्म, ध्यान, त्याग और तपस्या का क्रम निरंतर जारी है। श्री अक्षयमुनिजी मसा की प्रेरणा से धर्मसभा में संतोषी बाफना छुरिया ने 33, प्रिया श्रीश्रीमाल व स्नेहल लोढ़ा ने 30, नमिता नाहटा ने 27, ईशा तातेड ने 26 तथा कुसुम सौरभ नाहटा ने 14 उपवास की तपस्या का संकल्प लिया। जैन परंपरा के अनुसार उपवास तपस्या के दौरान केवल सूर्योदय के बाद से सूर्यास्त से पूर्व तक गर्म जल ग्रहण किया जाता है।
