विनोद जैन 
बालोद विनोद जैन – समता भवन मे विराजीत जैन संत श्री अक्षयमुनी जी मसा ने अपने प्रवचन श्रृंखला मे बताया की घर की बुराई बाहर मत करो प्रेम मायने रखता हैं, बहुएं सास को दोस्त, मित्र बना लो वही सास भी बहू के साथ मित्र जैसा व्यवहार करें। गलती को मत देखो नहीं तो छोटी सी गलती करोड़ों का प्रेम का सत्यानाश कर देती है सिर्फ नासमझी के कारण। व्यक्ति का यश फैलता है गुण के कारण धर्म जिंदगी भर चलता रहा है। जिनशासन के लिए समय दो जिससे देश व समाज में नई दिशा मिलेगी। जिम्मेदारी के साथ अनुशासन के साथ मानव जीवन को सफल बनाना है। किसी से सुख मांगने की जरूरत नहीं है वजह मत ढूंढो स्वयं के भीतर में ही सुख रहा हुआ है,
जैन मुनि ने आगे कहा कि मन ,वचन ,कर्म जिसके एक हो गए हैं वह महात्मा है और अलग-अलग हो जाए वहां दूरात्मा, संसारी आत्म जीवन का खेल वैसा ही है जैसे डिक्शनरी में शब्द है लेकिन संगीत नहीं है। भेड़ चलाने वाला हमेशा आगे रहता है उसने भेड़ से संवाद बना लिया है, उनके इशारे भेड़ चली जाती है ठीक उसी प्रकार एक आदमी ऐसा है जो पीछे से अलग-अलग भेड़ें को भगाता रहता है। वैसी ही हमारे पांच इंद्रिय व हमारा मन है। मन के साथ इंद्रियों का संचार बना ले नहीं तो सभी अलग-अलग दिशाओं जा रहे हैं। आदमी को समझ में नहीं आ रहा है। हम क्या कर रहे हैं इसका हमें पता ही नहीं है मानव के पास काबिलियत बहुत है लेकिन उसका प्रयोग ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा है
अक्षयमुनि ने आगे कहा कि जिंदगी को संघर्ष से नहीं सेलिब्रेशन की तरह जीना चाहिए। कृष्ण ने प्रेम की बांसुरी बजाई उन्होंने कभी सन्यास की दृष्टि अपनाने को नहीं कहा, वही महावीर ने सन्यास की राह बताई। जो है जैसा है उसी में संगीत बजाओ । बाहर की चीज अच्छी दिखती लेकिन अंदर की चीज ही काम आएगी। नारी घर की शोभा है और आदमी दुकान की और दोनों को मिलकर धर्म सभा को संभालना चाहिए।कुदरत का नियम है जितना सुख भोगेंगे उतना ही दुख पाएंगे। व्यक्ति को कभी भी तनाव में नहीं जीना चाहिए नहीं तो ज्यादा डिप्रेशन में रहता है, जानवर कभी भी तनाव में नहीं रहता है। संसार की रचना सुख और दुख पर ही टिकी हुई है। सेवा करने से कष्ट निकल जाते हैं लेकिन आदमी उलझा हुआ है परेशान है । घर परिवार में हमेशा संतुलन बनाकर रखना चाहिए।सेवाभावी संत दिनेश मुनिजी मसा ने कहा कि व्यक्ति को मिली शक्ति का उपयोग अच्छे कार्य में सदुपयोग करना चाहिए। राग ,द्वेष ,मोह, माया से दूर रहना चाहिए। मानवता का गुण का अच्छी तरह से पालन करें । हिंसा, दुर्गति में ले जाने वाली है वही धर्म सद्गति की ओर ले जाएगा।—-
तपस्वी निरंतर उपवास तपस्या का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं। सिर्फ गर्म जल के आधार पर जैन धर्म में उपवास तपस्या कहा गया है।
