विनोद जैन
बालोद | छत्तीसगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में गौवंश को केवल पशु नहीं, बल्कि ‘गौ माता’ का सम्मान प्राप्त है। सनातन धर्म में गाय के प्रति श्रद्धा और सेवा की परंपरा सदियों पुरानी है। ऐसे में यदि किसी गौशाला में गौवंशों को पर्याप्त चारा और पानी उपलब्ध नहीं हो रहा हो, तो यह केवल व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और धार्मिक आस्था से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।
बालोद शहर के डैम क्षेत्र के समीप, देसी भट्टी शराब दुकान से लगे परिसर में संचालित बताई जा रही गौशाला से सामने आई तस्वीरें इसी ओर इशारा करती हैं। तस्वीरों में बड़ी संख्या में गौवंश एक खुले, कीचड़युक्त परिसर में दिखाई दे रहे हैं। कई गौवंश अत्यंत कमजोर एवं दुबले नजर आ रहे हैं। एक ओर बड़ी संख्या में पशु एक जगह खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर एक गौवंश जमीन पर पड़ा दिखाई दे रहा है।
सूत्रों से मिली जानकारी ने बढ़ाई चिंता
स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस गौशाला में कई दिनों से गौवंशों के लिए पर्याप्त चारा और पानी उपलब्ध नहीं कराए जाने की चर्चा है। सूत्रों का यह भी कहना है कि गौवंशों की देखभाल और भोजन-पानी की व्यवस्था को लेकर स्थिति संतोषजनक नहीं है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है। इसलिए संबंधित नगर पालिका एवं जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है।
सूत्रों के अनुसार यह गौशाला नगर पालिका द्वारा संचालित की जाती है, जिसकी आधिकारिक पुष्टि और संचालन व्यवस्था की जानकारी संबंधित नगर पालिका से प्राप्त किया जाना आवश्यक है।
बालोद जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, बालोद शहर तांदुला (आदमाबाद) डैम के समीप स्थित है और तांदुला डैम बालोद का प्रमुख स्थल है।
*क्या गौशाला में सिर्फ संख्या बढ़ाना उद्देश्य है या सेवा भी?*
गौशाला का उद्देश्य केवल निराश्रित गौवंशों को एक स्थान पर एकत्र करना नहीं, बल्कि उनके लिए पर्याप्त चारा, स्वच्छ पेयजल, छायादार आश्रय, साफ-सफाई, उपचार और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना भी है।
यदि वास्तव में कई दिनों से गौवंशों को पर्याप्त चारा-पानी नहीं मिला है, तो यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का विषय हो सकता है। खासकर तब, जब गौशाला किसी नगरीय निकाय की देखरेख में संचालित हो रही हो।
सनातन आस्था के बीच उठता बड़ा सवाल
सनातन परंपरा में गाय को “गौ माता” कहा जाता है। धार्मिक मान्यता में गौ सेवा को पुण्य कार्य माना गया है। ऐसे में गौशाला के भीतर यदि कोई गौवंश भूख-प्यास से परेशान दिखाई देता है तो सवाल स्वाभाविक है—
क्या गौ माता की सेवा केवल धार्मिक आयोजनों और नारों तक सीमित रह गई है?
जिस गौवंश के संरक्षण और सेवा की बात समाज में बड़े स्तर पर की जाती है, उसी गौवंश के लिए यदि चारा-पानी की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं हो पाए तो यह पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है।
तस्वीरें बयां कर रहीं व्यवस्था की कहानी!
मौके से सामने आई तस्वीरों में बड़ी संख्या में गौवंश एक साथ दिखाई दे रहे हैं। परिसर की जमीन कई स्थानों पर गीली और कीचड़युक्त नजर आ रही है। कुछ पशु काफी कमजोर दिखाई देते हैं। एक गौवंश जमीन पर पड़ा हुआ भी दिखाई दे रहा है।
इन तस्वीरों के आधार पर किसी पशु की बीमारी या मृत्यु का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन तस्वीरें निश्चित रूप से गौशाला की व्यवस्था और पशुओं की स्थिति की जांच की जरूरत को सामने रखती हैं।
नगर पालिका से जवाब अपेक्षित
यदि गौशाला वास्तव में नगर पालिका द्वारा संचालित है, तो नगर पालिका प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि—
गौवंशों के लिए प्रतिदिन कितनी मात्रा में चारा उपलब्ध कराया जाता है?
पीने के पानी की नियमित व्यवस्था क्या है?
गौशाला में वर्तमान में कितने गौवंश हैं?
उनकी देखभाल के लिए कितने कर्मचारी नियुक्त हैं?
पशु चिकित्सक की नियमित जांच होती है या नहीं?
चारा-पानी एवं देखरेख पर कितना बजट खर्च किया जा रहा है?
गौशाला की सफाई और बरसात के दौरान जल निकासी की क्या व्यवस्था है?
कमजोर एवं बीमार गौवंशों के उपचार की क्या व्यवस्था है?
