चंद्रहास वैष्णव 
बस्तर गोंचा महापर्व 2026 के निर्धारित कार्यक्रम के तहत 29 जून से 14 जुलाई तक चले भगवान श्रीजगन्नाथ स्वामी के दर्शन वर्जित अनसर काल की समाप्ति के बाद आज बुधवार 15 जुलाई को रियासत कालीन श्रीजगन्नाथ मंदिर में शताब्दियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए भगवान श्रीजगन्नाथ, माता सुभद्रा एवं बलभद्र स्वामी के विग्रहों को मंदिर के गर्भगृह के बाहर भक्तों के दर्शनार्थ स्थापित किया गया। परंपरानुसार 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पदेन पाढ़ी उमाशंकर पाढ़ी एवं पदेन पानीग्राही राधाकांत पानीग्राही ने नेत्रोत्सव पूजा विधान संपन्न करवाया। नेत्रोत्सव पूजा विधान संपन्न करवाने वाले पंडित सुधांशु पाढ़ी एवं प्रदीप पाढ़ी ने अपना याेगदान दिया। इसके साथ ही बस्तर गोंचा महापर्व की विविध पूजा विधान परंपरानुसार संपन्न किये जायेगे।
360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पदेन पानीग्राही राधाकांत पानीग्राही ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से उनके परिवार द्वारा निभाई जा रही है। नेत्रोत्सव के दौरान भगवान के विग्रहों का विशेष श्रृंगार, पूजन, हवन एवं वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा-अर्चना की गई। अनसर काल के पश्चात भगवान को खिचड़ी का विशेष भोग अर्पित किया गया, जिसे श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। उन्हाेने बताया कि 15 दिनों के अनसर काल के बाद भगवान श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्र स्वामी के प्रथम दर्शन और महाप्रसाद का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। उन्होंने बताया कि 16 जुलाई को बस्तर गोंचा महापर्व में भगवान श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्र स्वामी के 22 विग्रहों को रथारूढ़ कर श्रीगाेंचा पूजा विधान संपन्न करवाया जायेगा।
नेत्रोत्सव पूजा विधान संपन्न करवाने वाले पंडित सुधांशु पाढ़ी ने बताया कि भगवान श्रीजगन्नाथ भक्त-श्रद्धालु के लिए अस्वस्थ हंए, अनसर काल के दौरान 15 दिनों तक भक्त-श्रद्धालु काे भगवान के दर्शन से वर्जित हाेना पड़ा। इतने दिनों तक भक्तो-श्रद्धालुओं के लिए भगवान श्रीजगन्नाथ के सुदर्शन चक्र के रक्षा सूत्र से विलग होने जैसे व्याकुलता को दूर करने के लिए भगवान श्रीजगन्नाथ श्रीमंदिर के बाहर भक्तो-श्रद्धालुओं के नयनाभिराम के लिए भगवान का भक्तो-श्रधालुओं के पास आना, यह भगवान श्रीजगन्नाथ का भक्तो-श्रद्धालुओं के साथ आध्यात्मिक मिलन ही नेत्रोत्सव कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि भगवान श्रीजगन्नाथ के श्रीमंदिर के बाहर भक्तो-श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए उपलब्धता, भगवान के भक्तो-श्रद्धालुओं से मिलन का यह अवसर या क्षण निकटतम दर्शन का पुण्य लाभ ही नेत्रोत्सव है।
