चंद्रहास वैष्णव
जगदलपुर/दंतेवाड़ा।
बस्तर और दंतेवाड़ा जिले के प्रभावित ग्रामीणों ने बोधघाट बहुउद्देश्यीय परियोजना और कोत्तागुड़ेम–किरंदुल रेलवे लाइन को लेकर कड़ा विरोध दर्ज किया है। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों परियोजनाओं को ग्रामसभाओं को जानकारी दिए बिना और उनकी अनुमति लिए बगैर ही पुनः अनुमति दी गई है, जो कि संविधान और कानूनों का उल्लंघन है।
बोधघाट परियोजना पर आपत्ति
इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित परियोजना से 500 मेगावाट बिजली उत्पादन और दंतेवाड़ा, सुकमा व बीजापुर में सिंचाई सुविधा का दावा।
अनुमानित लागत 22,653 करोड़ रुपये।
ग्रामीणों का आरोप: यह परियोजना स्थानीय आदिवासियों के हित में नहीं बल्कि कॉर्पोरेट घरानों के लिए है।
परियोजना से 56 गाँव उजड़ने की आशंका, हजारों लोग होंगे प्रभावित।
पीने के पानी के लिए केवल 30,000 मिलियन लीटर, जबकि उद्योगों के लिए 5 लाख मिलियन लीटर आरक्षित।
ग्रामीणों का सवाल: बिना वनाधिकार दावों के निपटान और पुनर्वास योजना के, विस्थापन कैसे होगा?
रेलवे लाइन पर आपत्ति
सुकमा और दंतेवाड़ा जिलों से गुजरने वाली कोत्तागुड़ेम–किरंदुल रेलवे लाइन का सर्वेक्षण शुरू।
प्रभावित गाँवों को इस लाइन की कोई जानकारी नहीं दी गई और न ही अनुमति ली गई।
कानूनी उल्लंघन का आरोप
PESA अधिनियम 1996 की धारा 4(d), 4(e), 4(i) का सीधा उल्लंघन।
छत्तीसगढ़ PESA नियम 2022 के अनुसार RPMC को निर्णय का अधिकार है, परन्तु कोई परामर्श नहीं।
वनाधिकार मान्यता अधिनियम (FRA) 2006 की धारा 4(5) का उल्लंघन — लंबित दावों का निपटारा किए बिना भूमि अधिग्रहण।
संविधान की पाँचवीं अनुसूची और सुप्रीम कोर्ट के फैसले (समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, 1997) की अवहेलना।
ग्रामीणों की मांगें
1. जब तक ग्रामसभाओं को पूरी जानकारी देकर उनकी लिखित अनुमति नहीं मिलती, दोनों परियोजनाओं की सभी गतिविधियाँ तत्काल रोकी जाएँ।
2. RPMC की भूमिका सुनिश्चित की जाए, उसकी स्वीकृति के बिना कोई निर्णय न लिया जाए।
3. सभी लंबित वनाधिकार दावों का निपटारा होने तक कार्यवाही स्थगित हो।
4. यदि कानूनों की अनदेखी कर कार्य आगे बढ़ाया गया, तो इसे अवैधानिक और जनविरोधी माना जाएगा और इसके लिए प्रशासन जिम्मेदार होगा।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी आवाज को नजरअंदाज कर कार्यवाही जारी रखी गई तो वे आंदोलन को तेज करेंगे।
