किसान से लेकर सभी वर्ग के लोग बड़े ही उत्साह के साथ महुआ के फूल को बटोरने जाते हैं, साल भर किसान महुआ के फल और फूल का करते है इंतजार. लेकिन उनके उम्मीदों पर कुदरत का कहर बरस पड़ा..

मनीराम सिन्हा .

नरहरपुर. प्राकृतिक रूप से आई आंधी तूफान से किसान वर्ग के लोगों पर सबसे अधिक प्रभाव देखने को मिलता है चाहे बरसात हो या ठंड या गर्मी। मौसम की मार किसानों की आर्थिक स्थिति पर बुरा असर डाला है. बारिश, आंधी तूफान और ओला के चलते किसानों की महुआ एवं धान की फसल नष्ट हो गई है. जिसके चलते उन पर आर्थिक संकट आ गया है. बता दें किसानों के लिए महुआ एवं धान की फसल सबसे कीमती फसल होती है. यह बताना लाजिमी होगा नरहरपुर विकासखण्ड आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, यह चारों ओर जंगल से घिरा हुआ है, या यूं कहें कि इस क्षेत्र को प्रकृति का वरदान मिला हुआ है. यहां कई ऐसे पेड़ पौधे हैं, जो लोगों के लिए जीवन यापन का बड़ा माध्यम है. इन्हीं में से एक महुआ का पेड़ है. महुआ का पेड़ काफी कीमती होता है, इसका फूल, फल सब कुछ बहुत बहुमूल्य होता है. साल भर लोग इसके फल और फूल का इंतजार करते हैं, क्योंकि यह काफी कीमती दामों पर बिकता है, या यूं कहें कि किसानों का ये बचत बैंक माना जाता है. मुश्किल घड़ी में काम आने वाला पैसा माना जाता है, लेकिन इस बार किसानों के इस बचत बैंक पर भी कुदरत का कहर बरपा है. इस बिगड़ते मौसम ने महुआ की फसल को भी चौपट कर दिया है. पिछले 15-20 दिन से महुआ की फसल आनी शुरू हुई है. महुआ के पेड़ पर महुआ के फूलों का लगना शुरू हुआ है. उसी समय से ही मौसम ने करवट बदली है, कभी बारिश होती है कभी बादल आते हैं. महुआ के फसल के लिए यह सभी बहुत घातक हैं. बादल गरजना, बिजली चमकना, ओले गिरना यह महुआ की फसल को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. बारिश के चलते जो थोड़ी बहुत महुआ की फसल आ रही, उसे लोग सुखा नहीं पा रहे हैं. वह नष्ट हो जा रही है. इन दिनों तो आलम यह है कि पेड़ों के नीचे महुआ के फूल गिरते रहते हैं, लेकिन कोई उसे समेटने वाला नहीं है. लोग अब महुआ की फसल को समेटने ही नहीं जाते हैं.

*मौसम की मार, महुआ की फसल बेकार:*

नरहरपुर विकासखण्ड में काफी तादात में महुआ के पेड़ पाए जाते हैं. जब महुआ के पेड़ पर फूल लगते हैं तो उसे समेटने के लिए किसान से लेकर सभी वर्गों के लोगों में एक अलग ही क्रेज देखा जाता है. किसान बड़े ही उत्साह के साथ महुआ के फूल को बटोरने जाते हैं, फिर उसे घर लाकर सुखाते हैं. उसके बाद अच्छी कीमत पर बेचते हैं. जिससे उन्हें पैसे भी मिल जाते हैं और उनका काम भी चल जाता है. इसीलिए महुआ के फूल को किसानों का बचत बैंक भी कहा जाता है. सभी वर्ग के लोग इस मौसम में सुबह-सुबह इकठ्ठे होकर महुआ के फूल बटोरने जाते हैं. कभी कभी वे रात-रात भर महुआ के पेड़ के नीचे उसकी रखवाली करते हैं. पिछले 15-20 दिन से जब से महुआ की फसल आनी शुरू हुई है, तभी से मौसम ने भी बिगड़ना शुरू किया है. अब आलम यह है कि जिस तरह से आसमान में बादल आते हैं, आंधी तूफान चलता है और बिजली चमकती है, उसकी वजह से महुआ की फसल नष्ट हो चुकी है।

*मुश्किल घड़ी का सहारा:*

देखा जाए तो महुआ की फसल ग्रामीणों के लिए मुश्किल घड़ी का एक बहुत बड़ा सहारा है. महुआ की फसल पर ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ा अधिकार महिलाओं का होता है. इसे समेटने के लिए भी ज्यादातर महिलाएं ही जाती हैं. सुखाने से लेकर बेचने तक का काम महिलाएं ही करती हैं. इससे जो पैसे आते हैं, उसका इस्तेमाल भी ज्यादातर जगहों पर महिलाएं ही करती हैं, इसलिए महुआ की फसल को महिलाओं का ही पैसा माना जाता है. ग्रामीण बताते हैं कि साल भर वह इसका इंतजार करते हैं कि महुआ की फसल आएगी और वह उससे कुछ पैसे बनाएंगे, लेकिन मौजूदा साल बड़ा झटका लगा है. ग्रामीणों की मानें तो महुआ की फसल को बेचकर वह कुछ पैसे कमा लेते हैं लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हो पाएगा क्योंकि फसल पूरी तरह से नष्ट हो गई है.