जगदलपुर में रिलीज हुई चर्चित ओड़िया फिल्म ‘मालीपुट मेलोडीज’, वास्तविक जीवन और स्थानीय संस्कृति को दर्शाती हैं चार कहानियां

चंद्रहास वैष्णव

जगदलपुर:
ओडिशा के दक्षिणी अंचल (कोरापुट-जयपुर) की मिट्टी से जुड़ी चर्चित ओड़िया फीचर फिल्म ‘मालीपुट मेलोडीज’ अब बस्तर संभाग के जगदलपुर में भी रिलीज हो गई है। फिल्म का प्रदर्शन शहर के बिनाका मॉल स्थित सिनेप्लस में शुरू किया गया है। इस उपलक्ष्य में फिल्म की पूरी टीम ने जगदलपुर में एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर फिल्म की विशेषताओं और इसकी पृष्ठभूमि को साझा किया।

*अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिल चुकी है सराहना*
प्रेस वार्ता के दौरान फिल्म के निर्देशक विशाल पटनायक ने बताया कि पिछले साल नवंबर में आयोजित 54वें ‘इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ (IFFI) के ‘इंडियन पैनोरमा’ सेक्शन में देश भर की लगभग 1200 फिल्मों में से टॉप 25 फिल्मों का चयन किया गया था, जिसमें ‘मालीपुट मेलोडीज’ एकमात्र ओड़िया फिल्म थी। गोवा में विभिन्न भाषाई दर्शकों ने भी इसे खूब सराहा था।

*चार कहानियों का अनोखा संगम (एंथोलॉजी)*
फिल्म के निर्देशक विशाल पटनायक एवं लेखक सुधाकर पटनायक ने बताया कि यह कोई पारंपरिक हीरो-विलेन वाली फिल्म नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से स्थानीय जनजीवन, संस्कृति और आम लोगों के संघर्षों पर आधारित एक यथार्थवादी (रियलिस्टिक) सिनेमा है। फिल्म 2 घंटे 7 मिनट की है, जिसे चार अलग-अलग कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है:

* पहली कहानी: मिट्टी के खिलौने व गुड़िया बनाकर बेचने वाले कुम्हार के जीवन और कोरोना काल में उसकी चुनौतियों को दर्शाती है।
* दूसरी कहानी: बेहतर भविष्य की तलाश में बड़े शहरों (पुणे, बेंगलुरु आदि) पलायन करने वाले युवाओं की जमीनी हकीकत और घर लौटने की व्यथा पर केंद्रित है।
* तीसरी कहानी: पारंपरिक बाजा (बैंड पार्टी) बजाने वालों के जीवन और आधुनिक मशीनी दौर में उनके संघर्ष को बयां करती है।
* चौथी कहानी (इंटरवल के बाद): एक मध्यवर्गीय परिवार में शादी के ताने-बाने, तैयारियों और उसके पीछे छिपे यथार्थ व हास्य को खूबसूरती से दिखाती है।

*बस्तर और कोरापुट का गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव*
फिल्म के संगीतकार एवं गीतकार तोष नंदा ने कहा कि बस्तर और जयपुर/कोरापुट का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक नाता सदियों पुराना है। दोनों ही अंचलों की बोली, परंपराएं और रीति-रिवाज एक-दूसरे से काफी मेल खाते हैं। उन्होंने बताया कि इस फिल्म का कुल बजट लगभग 35 से 40 लाख रुपये रहा है और इसमें 35 से अधिक मुख्य कलाकारों सहित 200 से अधिक स्थानीय लोगों ने अभिनय किया है।

फिल्म की भाषा हालांकि ओड़िया है, लेकिन इसमें प्रयुक्त बोली बस्तर व कोरापुट सीमावर्ती क्षेत्र की मिली-जुली (भतरी/देशीया प्रभाव वाली) आम बोलचाल की भाषा है। फिल्म निर्माताओं ने जगदलपुर व बस्तरवासियों से अपील की है कि वे सिनेमाघरों में जाकर अपनी ही माटी और संस्कृति से जुड़ी इस फिल्म को अवश्य देखें।