बस्तर में न्याय की दहाड़: हाईकोर्ट खंडपीठ की मांग के लिए जन आंदोलन का आगाज़

चंद्रहास वैष्णव

बस्तर संभाग में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की खंडपीठ (Bench) स्थापित करने की मांग ने अब एक निर्णायक मोड़ ले लिया है। जगदलपुर जिला अधिवक्ता संघ और बस्तर चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ने हाथ मिलाकर इस मांग को एक बड़े जन आंदोलन में बदलने की रणनीति तैयार की है। यह संघर्ष केवल कानूनी पेशावर लोगों का नहीं, बल्कि बस्तर के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है।

1. ऐतिहासिक संदर्भ और भौगोलिक विवशता
अधिवक्ताओं ने इस आंदोलन की नींव रखते हुए ऐतिहासिक तथ्यों और बस्तर की कठिन भौगोलिक स्थिति को रेखांकित किया है:
1956 का परिदृश्य: जब मध्य प्रदेश का गठन हुआ, तब जबलपुर में हाईकोर्ट और इंदौर-ग्वालियर में खंडपीठें बनाई गईं। उस समय भी जगदलपुर से जबलपुर की दूरी लगभग 650-700 किलोमीटर थी।
राज्य गठन के बाद की स्थिति: वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद उम्मीद थी कि न्याय आदिवासियों के करीब आएगा। लेकिन आज भी कोंटा और बीजापुर जैसे सुदूर क्षेत्रों के ग्रामीणों को बिलासपुर हाईकोर्ट पहुँचने के लिए उतनी ही मशक्कत और लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
दूरी का संकट: आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए इतनी दूर जाकर न्याय पाना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है।

2. अन्य राज्यों के सफल उदाहरण: जब वहां हो सकता है, तो बस्तर में क्यों नहीं?
आंदोलनकारियों ने तर्क दिया है कि जब देश के अन्य हिस्सों में न्याय के विकेंद्रीकरण के लिए खंडपीठें बन सकती हैं, तो बस्तर को इससे वंचित क्यों रखा जा रहा है?

अधिवक्ताओं ने कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां जनसंख्या और क्षेत्रफल कम होने के बावजूद कई खंडपीठ स्थापित की गई हैं:
कर्नाटक (2013): धारवाड़, कलबुर्गी में खंडपीठों की स्थापना।
पश्चिम बंगाल (2019): जलपाईगुड़ी में खंडपीठ का गठन।
महाराष्ट्र (2025): कोल्हापुर में हाल ही में खंडपीठ की स्थापना की गई है।
अधिवक्ताओं का मानना है कि इन राज्यों की तुलना में बस्तर की भौगोलिक और सामाजिक चुनौतियां कहीं अधिक जटिल हैं, जो यहाँ खंडपीठ की आवश्यकता को अनिवार्य बनाती हैं।

3. संयुक्त मोर्चा: चेंबर ऑफ कॉमर्स और बार एसोसिएशन की रणनीति
इस मांग को मजबूती देने के लिए बस्तर चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ने अपना 55 वर्षों का अनुभव और पूरा समर्थन जिला अधिवक्ता संघ को दे दिया है।
दशकों पुराना संघर्ष: चेंबर अध्यक्ष श्याम सोमानी ने स्पष्ट किया कि यह मांग नई नहीं है, लेकिन अब इसे निर्णायक अंजाम तक पहुँचाने का समय आ गया है।

अहिंसक और गैर-राजनीतिक: अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष विक्रमादित्य सिंह ने स्पष्ट किया है कि यह आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक, योजनाबद्ध और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होगा।
पत्राचार से सड़क तक: 2011 में शुरू हुआ पत्राचार का सिलसिला अब धरातल पर उतरने को तैयार है।

4. आगामी महाबैठक: 25 अप्रैल को बनेगा मास्टर प्लान
आंदोलन को संगठित रूप देने के लिए 25 अप्रैल को चेंबर भवन में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई है। इस बैठक के मुख्य बिंदु निम्नलिखित होंगे:
सर्वदलीय सहभागिता: सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है ताकि इसे “बस्तर की सामूहिक आवाज” बनाया जा सके।

सामाजिक संगठनों की भूमिका: समाज प्रमुखों और विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर आंदोलन की रूपरेखा तय की जाएगी।
मीडिया और जनसंपर्क: आंदोलन की आवाज को शासन और प्रशासन के कानों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने की रणनीति।

निष्कर्ष: न्याय के द्वार तक पहुँच की उम्मीद
बस्तर में हाईकोर्ट खंडपीठ की स्थापना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि आदिवासियों और आम जनता के न्यायिक उपचार (Judicial Remedy) के अधिकार को सुनिश्चित करने वाला कदम होगा। चेंबर ऑफ कॉमर्स और बार एसोसिएशन की यह एकजुटता बताती है कि बस्तर अब अपने हक के लिए खामोश नहीं रहेगा।

“न्याय में देरी, न्याय का हनन है।” बस्तर के संदर्भ में यह उक्ति तब तक सार्थक रहेगी जब तक खंडपीठ की स्थापना का सपना धरातल पर नहीं उतरता।