धूमधाम से मनाई गई संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती। उनके जीवन पर रखे गये विचार।


दीपक विश्वकर्मा

मनेन्द्रगढ़। संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की 525 वीं जयंती श्री राम मंदिर में तुलसी मानस प्रतिष्ठान मनेन्द्रगढ़ के तत्वावधान में धूमधाम से मनाई गई। सर्वप्रथम उपस्थित जनों ने गोस्वामी तुलसी दास जी के छायाचित्र पर माल्यार्पण कर पूजन अर्चन किया इसके साथ ही विश्व कल्याण की मंगल कामना करते हुये संगीत मय सामूहिक सुन्दर कांड पाठ किया गया।
आपको बता दें की तुलसीदास महाकाव्य रामचरितमानस, हनुमान चालीसा समेत कई हिंदू धर्मग्रंथों के रचयिता होने के साथ रामजी के भक्त थे। हर साल सावन शुक्ल पक्ष की सप्तमी को तुलसीदास जयंती मनाई जाती है।
इस अवसर पर श्री राम मंदिर के महंत ओम नारायण द्विवेदी, अधि. आर पी गौतम, ठाकुर प्रसाद केसरी,नीरज अग्रवाल, आर पी पांडे,वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश पाठक, परमेश्वर सिंह, बृज किशोर, शिवदत्त साहू, शंकर साहू,गोरे साहू,केशव प्रसाद, मनीराम, जगदम्बा अग्रवाल, रामधुन जायसवाल,सुभाष अग्रवाल, मेवालाल,भूपेंद्र सिंह, डेग मन राजवाडे उधनापुर,रघुवर सिंह, सुन्दर राम केवर्त,प्रीतम सिंह, सुजीत सिंह,दिनेश प्रसाद साहू,राम लखन रजक,खुशन लाल साहू, बलबीर सिंह,बबन सिंह, राम भरोस समेत क्षेत्र के श्रद्धालु काफी संख्या में मौजूद रहे।
आयोजन के द्वितीय चरण में गोस्वामी तुलसीदास जी पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संगोष्ठी का संचालन रामचरित द्विवेदी ने किया। उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आर पी गौतम ने कहा कि गोस्वामी जी को हिंदी साहित्य का महान संत, कवि और साहित्यकार माना जाता है। इन्होंने हिंदू महाकाव्य महाभारत, हनुमान चालीसा और कई हिंदू धर्म ग्रथों की रचना की। तुलसीदास 16वीं सदी के महान संत और कवियों में एक माने जाते है। तुलसीदास ने महाकाव्य श्रीरामचरितमानस, कवितावली, जानकीमंगल, विनयपत्रिका, गीतावली, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण की रचना की।आरएसएस से जुड़े नीरज अग्रवाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि कहा जाता है की जन्म लेते ही तुलसीदास जी के मुख से ‘राम’ शब्द निकला था। इसलिए उनका नाम रामबोला रखा गया। हिंदू कैलेंडर विक्रम संवत के अनुसार, तुलसीदास का जन्म संवत 1589 में हुआ था। इस्वी के अनुसार तुलसीदास का जन्म 1532 और मृत्यु 1632 बताई जाती है। भविष्य पुराण में तुलसीदास के पिता का नाम श्रीधर बताया गया है और तुलसीदास की माता का नाम हुलसी था।
समाजसेवी ठाकुर प्रसाद केसरी ने अपने उद्बोधन में कहा कि कम उम्र में ही तुलसीदास ने अकेले रहना सीख लिया और भिक्षा मांगकर जीवन बिताने लगे। कहा जाता है की एक बार तुलसीदास जब भूख से व्याकुल थे तब मां पार्वती भेष बदलकर उनके घर आई और उन्हें चावल खिलाकर पुत्र के समान पालन पोषण किया। सामाजिक कार्यकर्त्ता परमेश्वर सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि पालक के रूप में तुलसीदास को गुरु नरहरिदास मिले जिन्होंने उनका पालन-पोषण किया और शिक्षा-दीक्षा देकर विद्वान बनाया। पत्नी की प्रेरणा से उनका जीवन बदल गया और वो रामभक्त बन गए। इसके बाद तुलसीदास ने अपना संपूर्ण जीवन राम की भक्ति में समर्पित कर दिया।
कार्यक्रम संचालक रामचरित द्विवेदी ने अपने भाव व्यक्त करते हुये कहा कि समय बीतने पर तुलसीदास कई स्थानों में भ्रमण करने लगे और लोगों को भगवान राम की महिमा के बारे में बताने लगे। हनुमाजी की कृपा से तुलसीदास को चित्रकूट घाट पर प्रभु श्रीराम के भी दर्शन हुए। तुलसीदास ने कई ग्रंथ और कृतियों की रचना की जिसमें महकाव्य श्रीरामचरितमानस को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में 46वां स्थान प्राप्त है।

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