बिलासपुर

शिक्षा मनुष्य को पशु से ऊपर उठाने वाली सहज प्रक्रिया है। पशु अज्ञानी होता है उसे सही या गलत का बहुत कम ज्ञान होता है। अशिक्षित मनुष्य भी पशुतुल्य होता है। वह सही निर्णय लेने में समर्थ नहीं होता है। लेकिन जब वह शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसकी ज्ञानचक्षु खुल जाती है। शिक्षा मनुष्य के अंदर अच्छे विचारों को लाती है और बुरे विचारों को नष्ट करती है। शिक्षा मनुष्य के जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। यह मनुष्य को समाज में प्रतिष्ठित काम करने के लिए प्रेरणा देती है। शिक्षा के ही माध्यम से मानव समुदाय में अच्छे संस्कार डालने में पर्याप्त मदद मिलती है। शिक्षा की व्यापकता सीमित स्वार्थ में सिमटते जा रही है। स्कूली शिक्षा के माध्यम से ही, हम व्यक्तित्व, मानसिक कुशलता, नैतिक और शारीरिक शक्ति का विकास करना सीखते हैं। बिना उचित शिक्षा के, एक व्यक्ति अपने जीवन के सभी शैक्षिक लाभों से वंचित रह जाता है। शिक्षा निजी और पेशेवर जीवन में सफलता की इकलौती कुंजी है। शिक्षा हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान और कौशल को प्रदान करती है। यह सीखने की निरंतर, धीमी और सुरक्षित प्रक्रिया है, जो हमें ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो हमारे जन्म के साथ ही शुरु हो जाती है और हमारे जीवन के साथ ही खत्म होती है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली युवा पीढ़ी को किस ओर ले जा रहा है इस पर हम सभी को गंभीरता से विचार करना होगा। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने आज देश के नौजवान पीढ़ी को इस स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां उनके पास किताबी शिक्षा के अलावा कुछ भी नहीं है। आधुनिक शिक्षा क व्यवस्था ने छात्रों को भारतीय सभ्यता, संस्कृति, जीवन मूल्यों नैतिकता और परंपराओं से दूर कर दिया है। आधुनिक शिक्षा में डिग्री की प्रधानता, अनुशासनहीनता, दिशाहीन शिक्षा प्रणाली और नैतिक शिक्षा का घोर अभाव है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में कई नवीन प्रयोग तो हो रहे हैं लेकिन इससे समाज के अंदर जो खाई(गहराई)बनती जा रही है वह कभी पाटी नही जा सकती है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर गहन विचार करने के दौरान मेरे दिमाग में पिछली शिक्षा प्रणाली पद्धति याद आ गई। मैंने जो शिक्षा प्राप्त की, उसमें न माता-पिता पर और न ही ट्यूशन पर निर्भरता थी। पढ़ाई, खेल, दोस्ती, विद्यार्थी जीवन का हिस्सा हुआ करता था और वह पल बहुत आनंदमयी था। उन दिनों छुट्टी का दिन विद्यार्थियों के चेहरे पर उदासी लाने वाला होता था। छात्रों और शिक्षकों, और अभिभावकों के बीच अच्छा तालमेल और आपसी जुड़ाव था। एक खुलापन था, सम्मान था, विनम्रता थी क्योंकि सभी लोग मानते थे कि शिक्षण संस्थान विद्या का मंदिर के समान है। आपसी समझ थी. खुले संवाद से हर समस्या का समाधान निकाला जाता था। लेकिन आज की शैक्षणिक परिवेष पूरी तरह से बदल चुका है। आज के शिक्षक छात्रों को वही सिखाते है जो पाठयक्रमों में होता है। विद्यार्थियों की रुचि पर केंद्रित व्यवस्था नहीं होने के कारण उनका संपूर्ण जीवन तनावपूर्ण हो जाता है। शिक्षा प्रणाली हमें राजनीति, हमारे देश के इतिहास, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और भाषाओं को पढ़ाने के बारे में जानकारी दे रही है जो निस्संदेह संसाधनपूर्ण और उपयोगी है लेकिन क्या यह एकमात्र सही तरीका है या यह पर्याप्त है? हमारी शिक्षा प्रणाली की एक कमी यह भी है कि यह छात्रों को उनकी पूरी क्षमता से अपने विचारों का विस्तार करने की अनुमति नहीं देती है। पहली कक्षा से ही छात्रों को अपनी कक्षा में अव्वल रहने के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है, इसलिए वे बस इसे निगल लेते हैं और कागज पर उगल देते हैं। भारतीय शिक्षा प्रणाली छात्रों को सामाजिक विज्ञान, इतिहास और राजनीति के बारे में जानकारी देने के बाद 15 वर्ष की उम्र होने पर अपनी स्ट्रीम चुनने के लिए कहती है, जो व्यवहारिक जीवन में सही नहीं है। छात्र ने कभी भी पाठयक्रमों पर आधारित शिक्षा के अलावा अन्य विषयों और क्षेत्रों के बारे में खोज करने का अवसर नहीं मिल पाया। मुझे उम्मीद है कि शिक्षा प्रणाली छात्रों को विभिन्न क्षेत्रों के बारे में जानने में मदद करेगी और उन्हें अपने आईक्यू का विस्तार करने और अंकों के सांख्यिकीय डेटा के पीछे भागने के बजाय अपने जुनून की खोज करने की अनुमति देगी। इसके अलावा, कक्षा दस तक छात्र पर कोई दबाव नहीं डाला जाता है, अत्यधिक प्रचारित बोर्ड छात्र पर भारी दबाव बनाते हैं, जिसकी उन्हें आदत नहीं होती है। जेईई मेन्स, ओलंपियाड या प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करना कठिन है। इसके अलावा, हर साल, यह दबाव संभावित लड़कों के कई प्रतिभाशाली दिमागों पर हावी हो जाता है और उन्हें अपनी जान देने पर मजबूर कर देता है। जो बहुत ही दुखदाई होता है ।
*”निरंतर कोशिशों के बावजूद भी हो जाती हैं कभी हार”*
*पर होके निराश मत बैठना मन को अपने मार,*
*बढ़ते रहना …युवाओ …आगे सदा हो जैसा भी मौसम,*
*पा लेती हैं ‘मंजिल’ चीटियाँ भी… गिर-गिर कर हर बार……*
*””डॉ .सिस्टर क्लेरिटा डिमेलो “‘(प्रधानचार्य)
हॉली क्रॉस सीनियर सेकेंडरी स्कूल लालखदान बिलासपुर(छ.ग.)*
