चंद्रहास वैष्णव 
बस्तर में दशकों तक नक्सली हिंसा का गहरा दंश झेलने वाले पीड़ितों ने मंगलवार को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मौका था चिदंबरम के उस बयान का, जिसमें उन्होंने स्वयं को ‘दिमागी नक्सल’ (इंटेलेक्चुअल नक्सल) कहे जाने पर गर्व जताया था। ‘बस्तर शांति समिति’ के बैनर तले राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे इन नक्सल पीड़ितों, घायल नागरिकों और शहीद जवानों के परिजनों ने कड़े शब्दों में पूछा कि जो व्यक्ति देश का गृहमंत्री रहा हो, वह ऐसे खूनी विचार पर गर्व कैसे कर सकता है? क्या उन्हें बस्तर के उन हजारों परिवारों की पीड़ा नहीं दिखती, जिन्होंने इस हिंसा में अपना सब कुछ खो दिया?
पीड़ितों ने चिदंबरम के बयान पर तीखा प्रहार करते हुए सवाल उठाया कि यदि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर इतना ही गर्व है, तो क्या वे देश को यह स्पष्ट करेंगे कि नक्सलियों की रणनीति बनाने वालों में क्या वे भी शामिल थे? दिल्ली में प्रेस वार्ता करते हुए ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि वातानुकूलित कमरों में बैठकर नक्सलवाद पर चर्चा करना नेताओं के लिए कोई वैचारिक या राजनीतिक विमर्श का विषय हो सकता है, लेकिन बस्तरवासियों के लिए यह जीवन भर का ऐसा घाव है, जो आज भी रिस रहा है। जिन लोगों ने अपने परिजनों की लाशें उठाईं, गोलियां खाईं और बारूदी सुरंगों में अपने हाथ-पैर गंवाए हैं, उनके सामने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का महिमामंडन किसी भी लिहाज से गर्व का विषय नहीं हो सकता।
##आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती बस्तर की पीड़ा
प्रेस वार्ता के दौरान जब पीड़ितों ने अपनी खौफनाक आपबीती सुनाई, तो वहां मौजूद हर शख्स सन्न रह गया। 2009 में नक्सलियों की गोलियों का शिकार हुए गौतरिहा राम विश्वकर्मा और 2022 में खेत जाते समय गोली लगने के कारण हमेशा के लिए व्हीलचेयर और वॉकर तक सिमट चुके सियाराम रामटेके ने अपना दर्द बयां किया। इसी साल जनवरी 2026 में आईईडी ब्लास्ट में अपना पैर गंवाने वाले सीआरपीएफ कोबरा जवान रुद्रेश सिंह ने रुंधे गले से कहा कि नक्सली हिंसा की कीमत फाइलों और सरकारी आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। एक धमाके के पीछे किसी का शरीर, किसी का परिवार और किसी का पूरा भविष्य हमेशा के लिए तबाह हो जाता है। आरक्षक मोहन उईके और सालिक राम सिन्हा की शहादत के साथ-साथ पुलिस जवान अमर सिंह कुमेटी की स्थायी दिव्यांगता ने बस्तर के उस खौफनाक सच को देश के सामने रखा, जिसे अक्सर ‘वैचारिक खेल’ बताकर ढकने की कोशिश की जाती है।
##हमें बंदूक और भय नहीं, शांति और सड़क चाहिए
बस्तर शांति समिति ने देश के बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक दलों से स्पष्ट अपील की कि वे ‘दिमागी नक्सल’ जैसे संवेदनशील विषयों को राजनीतिक विमर्श के चश्मे से न देखें। इसे उन परिवारों की आंखों से देखें जिन्होंने इस खूनी विचारधारा की सबसे भारी कीमत चुकाई है। समिति ने कड़ा संदेश देते हुए कहा कि बस्तर को अब दिमागी नक्सल नहीं, बल्कि शांति चाहिए। बस्तर बंदूकों से पैदा किया गया भय नहीं, बल्कि विश्वास चाहता है। बस्तर की जनता ने बीते चार दशकों में नक्सलवाद से लड़कर उसके आतंक को खत्म किया है, और अब वे ‘दिमागी नक्सल’ के नाम पर इस जहर को दोबारा किसी भी कीमत पर नहीं पनपने देंगे। बस्तर अब हिंसा की काली छाया से बाहर निकलकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पक्की सड़कों के साथ विकास के रास्ते पर दौड़ना चाहता है।
