विनोद जैन 
बालोद – धर्म की समीक्षा बुद्धि व प्रज्ञा से होती है, बुद्धि को तो विश्राम दो, प्रज्ञा को जगाने का अवसर प्राप्त हुआ है। प्रज्ञा जगने से ही जन्मों जन्मों के लाखों करोड़ों पाप छूट जायेगा । सिर्फ बुद्धि जगने से व्यक्ति की बुद्धि काम नहीं आयेगी प्रज्ञा जगाने की जरूरत है। जिस प्रकार अरिहंत की माता करुणा है, संसार की माता निगोद, साधु की माता प्रवचन, हमारी माता यतना, धर्म की माता अहिंसा, अधर्म की माता हिंसा, पतन की माता अहंकार, परिवार की माता प्रेम, पुण्य की माता मानवता, पाप की माता लोभ, रोग की माता जीव्हा, यश की माता गुण, सुख की माता संतोषी , दुख की माता मोह। जिस प्रकार मां बेटे बेटी की दुख नहीं देख सकती ठीक उसी प्रकार किसी भी प्राणी का दुख साधु नहीं देख सकते। पाप, हिंसा बिल्कुल भी नहीं करें, नहीं तो संसार की निगोद की ओर जाना परिभ्रमण करना होगा। मानव को अहंकार कभी नहीं करना चाहिए धर्म स्थानक , धार्मिक क्षेत्र में तो बिल्कुल भी नहीं । उक्त उद्गार समता भवन बालोद में चातुर्मास प्रवचन सभा में शासन दीपक श्रीअक्षयमुनिजी मसा ने फरमाया।
जैन संत ने कहा कि व्यापार में विवेक रखना चाहिए। संघ के लिए भी कुछ करना है तो विवेक पूरा करें ना कि नाम के लिए। भगवान महावीर ने संघ बनाया संगठन नहीं।
नाम यश कमाने के लिए कभी भी संघ का उपयोग नहीं करना चाहिए। राजनीति राजनीतिक क्षेत्र में ठीक लगती है धर्म में नहीं। आज व्यक्ति नाम कमाने के चक्कर में अनर्गल कार्यों में संलिप्त है । धर्म से अहिंसा की ओर आगे बढ़ना है ना कि हिंसा की ओर। चेतना पर ध्यान देना आवश्यक है। संसार में रहते हुए प्रज्ञा को जगाना है। प्रेम को बेचकर मानव को कभी भी धन की दोस्ती नहीं करना चाहिए । व्यक्ति का अहंकार कभी काम नहीं आएगा भाव शुद्धि में ध्यान देना है ना कि द्रव्य शुद्धि में । अति मोह कभी मत करना यह पतन की ओर ले जाता है । सहज जीवन जीना चाहिए , कुदरत के माहौल में रहे। जिंदगी का खेल 99% मन पर टिका है । रिश्ते ही हमें जिंदा रखते हैं लेकिन आज के समय में देखते हैं कि धीरे-धीरे रिश्तो में भी दरारें आने लग गई है। मुनि श्री ने फरमाया कि दीवार में दरार पड़ती तो गिर जाती है और परिवार में दरार पड़ती है तो दीवाल खड़ी हो जाती है।
इसके पहले सेवा भावी संत श्रीदिनेश मुनिजी मसा. ने उपस्थित जन समुदाय को फरमाया की सरलता में ही धर्म टिकता है नहीं तो दोस्त भी दुश्मन बन जाता है। हर कार्य में सरल बनना है अहंकारी व्यक्ति धर्म से विमुख होता है। स्वयं को बदलने वाले व्यक्ति कभी दुखी नहीं बनता है ,जीवन में कई घटनाएं घटती है संकेत मिलने पर मानव स्वयं को बदले।
*चातुर्मास में त्याग तपस्या का लगा ठाठ*
जैन धर्म में त्याग तपस्या का विशेष महत्व है उपवास में सिर्फ गर्म जल के आधार पर तपस्या की जाती है। आज रितेश पारख ने 9, श्रीमती गुंजन ललवानी ने 9 , सोहन श्रीश्रीमाल 8, निर्मल नाहटा 8, अनिकेत ललवानी 7 , की तपस्या , सुनील ललवानी, श्रीमती इंदिरा बाफना, श्रीमती कविता नाहर, निकिता छाजेड़ , कंचन श्रीश्रीमाल, दृष्टि सांखला 5 , नरेंद्र बाफना, मीनू बाफना ने 4 उपवास की तपस्या का संकल्प ग्रहण किया है।
सभा का संचालन श्रीमती प्रिया श्रीश्रीमाल ने किया। धर्म सभा में आज भंडारा महाराष्ट्र,छुरिया, अछोली, डौंडीलोहारा सहित अनेक संघो के दर्शनार्थ उपस्थित थे।उक्त जानकारी प्रदीप चोपड़ा ने दी
