चंद्रहास वैष्णव 
नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक नेतृत्व का ऐतिहासिक सम्मान देखने को मिला। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के कुशल नेतृत्व में छत्तीसगढ़ से आए 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने देश के सबसे बड़े मंच पर बस्तर के गौरवशाली अतीत और जीवंत संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया।
इस विशेष अवसर पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने ‘बस्तर पंडुम-2026’ के विजेताओं, परगना मांझी, मांझी, चालकी, एवं पद्मश्री से सम्मानित बस्तर की महान विभूतियों के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में एक विशेष भोज का आयोजन किया। राष्ट्रपति ने स्वयं अतिथियों को भोजन परोसकर उनका आत्मीय स्वागत एवं सम्मान किया, जो इस आयोजन का सबसे भावुक और ऐतिहासिक क्षण रहा।
राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस ऐतिहासिक कार्यक्रम की प्रमुख बातें:
#अमूल्य धरोहर: राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इसे पूरे भारत की अमूल्य धरोहर करार दिया।
#बस्तर आगमन की इच्छा: उन्होंने बस्तर के विश्वप्रसिद्ध दशहरा पर्व तथा सांस्कृतिक उत्सव ‘बस्तर पंडुम’ में स्वयं शामिल होने की इच्छा व्यक्त की।
#पारंपरिक शासन व्यवस्था का सम्मान: राष्ट्रपति ने बस्तर की पारंपरिक ‘मांझी-चालकी’ व्यवस्था को सामाजिक एकता, अनुशासन और सांस्कृतिक संरक्षण की एक अटूट आधारशिला बताया।
बस्तर में शांति और विकास की सराहना: उन्होंने बस्तर क्षेत्र में लौट रही शांति, विकास की नई दिशा और वहां आ रही समृद्धि की सराहना की।
ऐतिहासिक क्षण: केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने इस अवसर पर कहा कि राष्ट्रपति भवन के इतिहास में यह पहली बार है जब बस्तर की जनजातीय संस्कृति, कला और वैभव का ऐसा भव्य स्वरूप देखने को मिला है।
‘झिटकू-मिटकी’ कलाकृति भेंट: मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने इस गौरवशाली अवसर पर राष्ट्रपति को बस्तर की लगभग 300 वर्ष पुरानी प्रसिद्ध लोकगाथा ‘झिटकू-मिटकी’ पर आधारित एक अनुपम ढोकरा हस्तशिल्प कलाकृति भेंट की।
*छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक*
यह भव्य और अभूतपूर्व आयोजन न केवल बस्तर, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता, जनजातीय अस्मिता और सदियों पुरानी समृद्ध परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान देने वाला सिद्ध हुआ है।
