हार्वेस्टर पर सख्ती या किसानों की मजबूरी कटाई के बीच बढ़ा विवाद नरवाई (फसल अवशेष) जलाने पर रोक के बीच भूसा प्रबंधन प्रणाली अनिवार्य, मजदूरों की कमी बनी चुनौती

दीपक विश्वकर्मा

उमरिया= खेती को लाभ का धंधा बनाने की बात लगातार की जाती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई बार ऐसे हालात बन जाते हैं, जहां नियम और वास्तविकता आमने-सामने खड़े नजर आते हैं। जिले में इन दिनों फसल कटाई का दौर चल रहा है, लेकिन हार्वेस्टर से कटाई को लेकर नया विवाद सामने आया है जनपद सदस्य एवं कृषि समिति के सभापति चंदन सिंह ने बताया कि गांव में एक हार्वेस्टर संचालक बिना भूसा प्रबंधन प्रणाली (एसएमएस) के कटाई कर रहा है, जो निर्धारित नियमों के विपरीत है। उन्होंने बताया कि खेतों में बचने वाली नरवाई (फसल अवशेष) को जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए शासन द्वारा सख्त नियम लागू किए गए हैं। इसी के तहत कटाई के दौरान भूसा प्रबंधन प्रणाली या स्ट्रॉ रीपर (पराली एकत्र करने वाला उपकरण) का उपयोग अनिवार्य किया गया है। यह निर्देश जिला प्रशासन द्वारा भी जारी किए गए हैं।
नरवाई और प्रदूषण का मुद्दा
हार्वेस्टर से कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में नरवाई बच जाती है। अक्सर किसान इसे हटाने के बजाय जला देते हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसी को रोकने के लिए प्रशासन द्वारा सख्ती बरती जा रही है।
लेकिन जमीनी हकीकत अलग
दूसरी ओर किसानों की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। मजदूरों की कमी लंबे समय से बनी हुई है और वर्तमान समय में यह समस्या और गहरी हो गई है। ऐसे में यदि हार्वेस्टर जैसी मशीनों के उपयोग पर शर्तें बढ़ाई जाती हैं, तो किसानों के सामने फसल कटाई का संकट खड़ा हो जाता है।
समय का दबाव भी बड़ा कारण
अप्रैल का महीना चल रहा है और जिले में अभी भी लगभग 60 से 75 प्रतिशत फसल की कटाई और गहाई बाकी है। ऐसे समय में कटाई में किसी भी प्रकार की बाधा किसानों के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकती है।
उठ रहे सवाल
क्या बिना पर्याप्त संसाधनों के सख्त नियम लागू करना व्यवहारिक है?
क्या हार्वेस्टर पर निर्भर किसानों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध है?
और यदि हार्वेस्टर से कटाई नहीं होगी, तो फसल समय पर कैसे कटेगी?
इनका कहना है
आज हार्वेस्टर किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। जो काम पहले 10 दिन में होता था, वह अब एक दिन में पूरा हो जाता है और लागत भी पहले की तुलना में लगभग दसवां रह गई है। लगभग 2000 रुपये प्रति एकड़ में कटाई संभव हो जाती है, जबकि मजदूर किसी भी हालत में उपलब्ध नहीं होते। कई बार स्थिति ऐसी बन जाती है कि मजदूर ही कहते हैं—“आप हमारे यहां आकर कटाई कर लो,” क्योंकि स्थानीय स्तर पर कटाई-उठाई का कोई ठोस विकल्प उपलब्ध नहीं रहता।
आत्मा योजना की सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष कमल सिंह राठौर
उप संचालक कृषि संग्राम सिंह मरावी का कहना है कि हार्वेस्टर पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शासन के नियमों के अनुसार कटाई के दौरान स्ट्रॉ रीपर अथवा भूसा प्रबंधन प्रणाली का उपयोग आवश्यक है, ताकि खेतों में बचने वाली नरवाई को जलाने की समस्या और उससे होने वाले प्रदूषण से बचा जा सके। उन्होंने किसानों से अपील की कि निर्धारित उपकरणों का उपयोग करते हुए सुरक्षित और नियमों के अनुरूप कटाई करें।
हालांकि, समाचार लिखे जाने तक कुछ स्थानों पर शासन द्वारा हार्वेस्टर के उपयोग पर रोक लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है।