विनोद जैन
बालोद -स्वतंत्रता की तरह बंधन का भी महत्व होता है ।बंधन वही अच्छा जो विकास करे,जो आनंद की अनुभूति कराए।जैसे मां का बंधन बच्चों के लिए हितकारी होता है ।रक्षाबंधन का त्यौहार भाई बहनों के बीच स्नेह का बंधन है। हमारे पूर्वजों की क्या दूर दृष्टि थी जिन्होंने पर्व एवम त्योहार के माध्यम से प्रेम सौहाद्र ,एकता,आनंदआदि की अनुभूति के अवसर प्रदान किये। संत ऋषभ सागरजी म सा ने रक्षा बंधन पर्व को स्नेह का बंधन बताते हुए कहा कि स्नेह का बंधन वो होता है जिसमें अपेक्षा नही बल्कि आत्मीयता होती है। इस बंधन की डोरी स्नेह की ,वचन की आत्मीयता की,कर्तब्य की होती है।समय के साथ इन संबंधों पर यदि धूल पड़ गई है तो उसे हटाने का यह अवसर हमे त्योहार के रूप में मिलताहै।हर रिश्ता जीवन मे महत्वपूर्ण होता है उस पर समय की धूल न पड़ने दें।भाई बहन के रिश्ते में स्नेह के साथ ही सम्मान का भाव होता है।जिनकी बहने नही होती उन्हें इसका एहसास होता है।संत श्री ने कहा कि भाई बहन के रिश्तों की कई कहानियां इतिहास में भरी पड़ी है।एक बार कृष्ण जी की उंगली में चोट लग जाती है तो द्रोपदी ने तुरंत साड़ी का टुकड़ा फाड़कर कृष्णजी के हाथ मे बांध दिया।यह बंधन ऐसा था की जब जब द्रोपती पर मुसीबत आई कृष्णजी उपस्थित हो जाते थे। भारत में प्रत्येक त्योहार के पीछे कुछ उद्देश्य जरूर रहा है उसे समझें। त्योहार हमे आपस मे जोड़ने के लिए होता है ,हम तोड़ने वालों में तो नही इसका ध्यान रखें।बहने इस अवसर पर भाइयों से कुछ ऐसी चीजें मांगे जो उनके लिए हितकारी हो जैसे नशा न करें, संबंधों में कुछ दूरी आ गई हो उसे दूर करें,अन्य कोई बुराई हो उसका त्याग करें।
