विनोद जैन
बालोद – करुणा,प्रेम ये आत्मा के गुण हैं इन्हें प्राप्त करने के लिए राग ,द्वेष अहंकार जैसे भावों पर नियंत्रण करना आवश्यक होता है।भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए जैसे हमारा सारा प्रयास होता है वैसे ही आत्मा के गुणों की प्राप्ति के लिए भी हमारा पुरुषार्थ होना चाहिए।दुनिया भर के जड़ पदार्थों में हम सुख तलाशते है,ये सुख स्थाई नही होते।मानवीय गुणों को आत्मसात करके ही हम सुख और शांति का अनुभव प्राप्त कर सकते है।
उक्ताशय के विचार संत ऋषभ सागरजी म सा ने जीवन दर्शन पर आधारित अपने व्याख्यान में व्यक्त किये ।उन्होंने कहा कि चेतन ओर जड़ के साथ जीना सीखे।चेतन से न द्वेष रखेंऔर न जड़ पदार्थो से राग।क्योकि आत्मा के लिए ये सब एक संयोग मात्र हैं।हमारा प्रयास आत्मा के गुणों के विकास के लिये होना चाहिए।किसी भी कार्य मे उपलब्धि से अधिक महत्वपूर्ण प्रयास होता है।सद्गुणों की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करें ,जमाना और परिस्थितियों पर दोषारोपण न करें।प्रतिदिन व्यख्यान सुन रहे हैं उसे जीवन मे उतारने का भी प्रयास करें।परमात्मा के बताये मार्ग पर चलकर ही सुख और शांति प्राप्त की जा सकती है।सभी जीव कर्म के अधीन हैं ,उनके स्वभाव को समझकर व्यवहार करें,सभी के प्रति धैर्य और समता का भाव रखें।हमे पैसे का नुकसान तो नुकसान लगता है लेकिन प्रेम के नुकसान में कोई नुकसान नहीदिखता।पैसे के लिए आपस के प्रेम को खत्म कर लेते हैं।वास्तव में गरीब वो होता है जो पैसा तो दे सकता है लेकिन प्रेम नही दे सकता।प्रेम घटता है तो अशांति बढ़ती है।पाप कर्म का उदय हो तो सब कुछ विपरीत होने लगता है।ऐसी परिस्थिति में भी स्वीकार्य भाव रखें अपने विचारों का न बिगड़ने दें।प्रयास करें परिस्थितियां कैसी भी हो हमारी करुणा ,प्रेम,दया आदि के भाव न बिगड़ें।
