विनोद जैन
बालोद-जीवन बहुत कीमती है ,इसे समझकर जीने वाले लोग बहुत कम ही होते है।छोटी छोटी बातों में उलझकर अपनी जीवन यात्रा बर्बाद कर लेते है।जीवन को संघर्ष पूर्ण बनाकर कोई श्रेष्ठ कार्य नही कर पाते।
संत ऋषभ सागरजी महराज साहब ने जीवन दर्शन पर आधारित अपने प्रवचन कोआगे बढ़ाते हुए कहा कि जीवन जीने का ज्ञान नही होने या है तोअभ्यास नही होने के कारण ही जीवन मे परेशानी या अशांति आती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में जीना सीखे।पिछली घटनाओं को पकड़कर न रखें।उन्होंने कहा कि जब हम हर चीज छांट छांट कर लेते है तो बुरे विचारों रूपी कचरा को क्यों दिमाग मे रखते है।राग ,द्वेष, क्रोध,अहंकार आदि कषाय दिमाग मे भरे कचरे के समान ही है ।हमारा व्यवहार यदि कटु है तो लोगों से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं।सहनशीलता के साथ ही एडजेस्टमेंट के गुणों को भी बढ़ाना होगा क्योकि सभी के विचार समान नही होते।मन को सहनशीलता और स्वीकार्यता के लिए सेट करें तो परिस्थितियां भी सेट हो जाती है।प्रतिकूलताओं में भी जीने का अभ्यास होना चाहिये क्योंकि परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नही रहती।परमात्मा ने राग द्वेष अहंकार आदि कषायों को कम करने का माध्यम तप को बताया है ।तप ,आराधना आदि के माध्यम से आत्मा की शुद्धि होती है तथा अच्छे गुणों का विकास होता है।उन्होंने कहा कि इस चातुर्मास में सभी अपनी अपनी क्षमतानुसार कोई न कोई तप अवश्य करें।
