आर एस भटनागर
जगदलपुर।शुद्ध एकादशी के पावन अवसर पर श्री बालाजी मंदिर में अभिषेक विधान संपन्न हुआ। मंदिर परिसर स्थित भगवान श्री बालाजी, माता श्री लक्ष्मी, माता भूदेवी, प्रथम पूज्य श्री गणेश और गरुड़ देव की प्रतिमाओं का गाय दूध और पंचामृत से अभिषेक किया गया। संपन्न हुए विशेष पूजा विधान के संदर्भ में जानकारी देते मंदिर के प्रधान अर्चक श्रीकांत आचार्य ने बताया कि देवशयनी एकादशी को आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है और यह हिंदू चंद्र माह आषाढ़ के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन आती है, सनातन संस्कृति में इस एकादशी का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु आज से 4 महीने की योग निद्रा में लीन हो जायेंगे। कार्तिक एकादशी तक भगवान का चातुर्मास शयनकाल होगा, इस दौरान जप- तप, पूजा, उपासना करने वाले भक्त भगवान के विशेष कृपा पात्र बनते हैं। श्री बालाजी टेंपल कमेटी के अध्यक्ष ए. वीरराजु एवं उपाध्यक्ष रविभुषण राव ने बताया कि अभिषेक विधान में शहर के भक्तों के साथ साथ दीगर ज़िलों और पड़ोसी राज्यों के भक्तगण भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। भक्तों ने पूजा के बाद मंदिर में आयोजित भंडारा में प्रसाद ग्रहण किया। बस्तर ज़िला आंध्र समाज के अध्यक्ष जयंत नायडू एवं सचिव सुब्बाराव ने बताया कि आषाढ़ माह के ग्यारहवें दिन, लोग देवशयनी एकादशी मनाते हैं, जिसे आषाढ़ी एकादशी, शयनी एकादशी या थोली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। शयन एकादशी को आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दुनिया भर में रहने वाले तेलुगु भाषियों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है, जिसे थोली एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल थोली एकादशी 17 जुलाई को मनाई जा रही है।
आज से चार माह की योग निद्रा में होंगे भगवान विष्णु…
किंवदंती है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु या तो सो जाते हैं या एकाग्रता या योग निद्रा की गहरी अवस्था में चले जाते हैं। भगवान विष्णु चार महीने बाद, प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस पर जागते हैं। इस दौरान सृष्टि का संचालन भगवान शिव के हाथों में आ जाता है। चार महीनों की इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के यह 4 महीने ध्यान और साधना करने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान शारीरिक और मानसिक स्थिति तो सही होती ही है, साथ ही वातावरण भी अच्छा रहता है।
