*मीसाबंदियो के त्याग तपस्या और राष्ट्रप्रेम को नमन– भाजपा जिला अध्यक्ष दिलीप पाण्डेय*

दीपक विश्वकर्मा

उमरिया जिला म0प्र0

भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के सबसे काले अध्याय, आपातकाल (25 जून, 1975), का विरोध करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की आस्था को संजोकर रखने वाले सभी सत्याग्रहियों को सादर नमन। वर्ष 1971 भारत के आम चुनाव में कांग्रेस को 352 सीटो के साथ बहुमत प्राप्त हुआ, इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनी। इंदिरा गांधी उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से अवैध तरीके से राजनारायण के सामने चुनाव जीती, उक्त सीट के चुनाव को राजनारायण इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंद्रा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया गया था।इलाहाबाद कोर्ट के फैसले को इंद्रा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनोती दी परन्तु सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी को सिर्फ प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति तो दी परन्तु अंतिम फैसले तक संसद में मतदान में भाग नही लेने का आदेश दिया, उक्त सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जयप्रकाश नारायण द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली केंद्र सरकार और कांग्रेस के विरुद्ध की गई जिसमे नारा दिया गया कि सिंहासन खाली करो, जनता आ रही है इस ऐतिहासिक रैली ओर देश मे तत्कालीन माहौल को देखकर इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ फकरुद्दीन अली से मिलकर 25 जून रात्रि में देश मे आपात काल लगा दिया गया।जिला अध्यक्ष जी ने कहा कि आपातकाल मतलबदेश के नागरिकों की आवाज बन्द विपक्ष की आवाज बन्द समस्त नागरिक के अधिकार समाप्त प्रेस मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया कांग्रेस के विरोध में काम करने वाले विरोधी पार्टी संगठन के नेताओ, कार्यकर्ताओ को रातों रात बलपूर्वक घरों से उठाकर, ले जाकर जेलों में डाल कर प्रताड़ित किया गया तानाशाही ओर मनमानी करके देश की और मीडिया की आवाज बिना कारण बन्द की गई आपातकाल में जितने भी देश भक्तों को जेलों में बंद किया गया वे निर्दोष थे कोई अपराध नही किया गया था, फिर भी विनाशकाले विपरीत बुद्धि वाला काम कांग्रेस और इंदिरा गांधी ने किया 21 महीने के आपातकाल में कई, सामाजिक कार्यकर्ता बिना अपराध के, बिना कारण जेलों में बंद रहे घर परिवार बर्बाद हुए,घर, परिवार ने कई समस्याओं का सामना किया परन्तु कांग्रेस की इतनी प्रताड़ना के बाद भी राष्ट्रभक्तो ने अपना राष्टीय कर्तव्य निभाते हुए कांग्रेस का विरोध किया। विरोध एक ज्वालामुखी बन कर सामने आयाl 21 मार्च 1977 को देश मे जैसे ही 21 माह बाद आपातकाल समाप्त हुआ, केंद्र सरकार और इंदिरा गांधी के विरुद्ध एक एक क्रांति का उदय हुआ, राष्ट्रभक्त नेताओ की संगठन में सक्रियता से देश का आम नागरिक जाग्रत हुआ कांग्रेस के विरुद्ध आवाज उठाने लगा, ओर देश मे आम चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, एक नए युग का शुभारंभ देश मे हुआ इंद्रा गांधी की हिटलरशाही, तानाशाही के कारण भारत के सभी समाजसेवी, संगठन देशभक्तों ने कांग्रेस के विरुद्ध देश मे एक माहौल खड़ा किया, यही आपातकाल कांग्रेस के सर्वांगीण पतन का कारण है!कांग्रेस की प्रताड़ना, ओर बिना कारण जेलों में बंद रहने वाले राष्ट्र भक्तों मीसाबंदी को भाजपा सरकार ने लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर उनका सम्मान किया। आज भाजपा का जो वट व्रक्ष हमे दिख रहा है वह वृक्ष लोकतंत्र के ऐसे बहादुर मीसाबंदियों की त्याग, तपश्या, संघर्ष का परिणाम है, जिन्होंने जीवन का सबसे कठिन समय जेलों में बिताया ओर अपना विरोध जारी रखा, किसी के आगे, सरकार के आगे झुके नही डटे रहे!आज इस अवसर पर में उन समस्त मीसाबंदियो को प्रणाम करता हु, आपका त्याग, संघर्ष आज की पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है, आपका संघर्ष देश कभी नही भूल सकता असली मायने मे लोकतंत्र के सजग प्रहरी मीसाबंदी ही है संविधान लोकतंत्र की रक्षा के खातिर अपने आपको खपा दिया कड़ी प्रताड़ना सही कईयो के घर बर्वाद हो गए सब उजड़ गया फिर भी देश और संविधान की रक्षा के खातिर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ समर्पित रहे। काग्रेश यानी लोकतंत्र की दुश्मन। काग्रेश सत्ता में नही है तब लोकतंत्र और संविधान की दुहाई दे रही है किंतु सत्ता न जाने पाए इस हेतु संविधान और लोकतंत्र को तार तार करने का कार्य काग्रेश ने किया है। संविधान में सेकुलरिज्म सब्द डाल कर इंद्रा एंड कम्पनी ने बाबा साहब का भी निरादर किया है। विपक्ष को जेल के डालकर संविधान संशोधन करना काग्रेश की कुत्सित मानसिकता का धोतक है। काग्रेश सत्ता के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है। सत्ता में रहने पर घोटाले और विपक्ष में रहने पर देश को विश्व पटल पर बदनाम करने और देशवासियों को गुमराह करने का असफल प्रयास काग्रेशियो के द्वारा किया जाता है।उधार के सरनेम से कोई महान नही बन जाता महान बनने के लिए ओजस्वी विचारों से युक्त जीवन जीना पड़ता है त्याग करना पड़ता है हिटलर वाला काम, गांधी बस नाम बाली बात को इनके क्रर्त्य चरितार्थ करते है भारत में संविधान को रौंद कर, तंत्र को बंदी बनाने वाले ‘गांधी’ कुनबे की सोच जर्मनी के तानाशाह से दो कदम आगे है अन्यथा विपक्ष को जेल में डालकर संविधान और तंत्र को बंधक बनाने की जरूरत क्या थी।
इंदिरा गांधी ने 51 बार राष्ट्रपति शासन लगाया था। 50 बार चुनी हुई राज्य सरकार को बर्खास्त किया था। जबकि नरेंद्र मोदी जी ने अबतक 1 भी राज्य सरकार को बर्खास्त नहीं किया तानाशाही रवैया किसका था लोकतंत्र की हत्या किसने की थी इस विषय पर सबको चिंतन करना चाहिये आपातकाल कांग्रेस की कलंक कथा है 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी 1 लाख से ज्यादा लोगों को जेल में डालनाRSS पर प्रतिबंध लगाना मीडिया दफ्तरों की लाइट काट दी गयी ताकि अखबार न छप पाए।अटल जी, आडवाणी जी जय प्रकाश जी जैसे नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। आपातकाल का विरोध करने वाले पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया।ये लोकतंत्र की हत्या नहीं तो और क्या थी काग्रेश ही लोकतंत्र की हत्यारी है आज जो काग्रेश के युवराज लोकतंत्र की दुहाई दे रहे है उन्हें अपने दादी के कुकृत्यों पर भी चर्चा करनी चाहिये कांग्रेस में चेहरे बदले होंगे लेकिन उसका चरित्र, उसके आवभाव आज भी वही है जो 1975 में एक बर्बर चेहरा कांग्रेस पार्टी का देखने को मिला था।कैसे उन्होंने संविधान की आत्मा को नष्ट करने का प्रयास किया थाl