यजुवेन्द्र सिंह ठाकुर 
काँकेर के मध्य से बहने वाली दूध नदी हमारी जीवन रेखा है, हम शहर वासियों के लिए मातृ स्वरूपा है। आप सबने अपने बुजुर्गों से सुना होगा कि एक समय ऐसा था, लगभग 40- 50 वर्ष पहले तक दूध नदी में भरपूर मात्रा में इतना स्वच्छ मीठा जल होता था कि उसे घर ले जाकर खाद्य पदार्थ उबाले जाते थे। गर्मी के दिनों में रात्रि में नदी के किनारे रेत पर किस्सा कहानी कहते हुए नागरिक तथा नवयुवक अक्सर वहीं गहरी नींद भी ले लिया करते थे। अब कहां गए वो दिन? कुछ तो जलवायु परिवर्तन और बहुत कुछ हमारे नागरिकों की लापरवाही के कारण दूध नदी अब पानी नहीं कीचड़ दे रही है। रेत का नामो- निशान नहीं रह गया है। कुछ समय बाद यह पूर्ण रूप से भी लुप्त हो सकती है। ऐसी स्थिति ना आए और दूध नदी अपने पुराने स्वरूप में वापस आ जाए, इस हेतु “जन सहयोग” तथा हमारे अन्य सहयोगी समाज सेवियों द्वारा “दूध नदी बचाओ महाभियान” वर्षों तक चलाया गया। फिलहाल वहां रिटेनिंग वॉल का निर्माण चल रहा है, इसलिए अभियान बंद है। अन्यथा दूध नदी के उद्गम से पैदल यात्रा अथवा साइकिल यात्रा तथा जन जागरूकता के अनेक कार्यक्रम हम लोगों द्वारा किये जा चुके हैं, जिसमें हमारे वर्तमान विधायक आशाराम जी ने भी तब से भाग लिया है, जब वे विधायक नहीं बने थे। आज की तारीख़ में हम काँकेर की जनता से विशेष कर नदी किनारे रहने वाले या दुकान करने वाले भाइयों से आग्रह करते हैं कि अपने यहां का कूड़ा कचरा दूध नदी में कृपया मत फेंकें। नगर पालिका की सेवाओं का सदुपयोग करें अथवा किसी और तरीक़े से कचरे का निष्पादन करें ,तो यह आप लोगों की बहुत बड़ी सेवा होगी। एक दिन में जो कई गाड़ी कचरा नदी में फेंका जाता है, उसमें यदि आप स्वयं रोकथाम करें तो कुछ ही दिनों में नदी में पानी की स्वच्छ धारा छोटे रूप में दिखने लगेगी और मातृस्वरूपा दूध नदी आप सबको आशीर्वाद देगी। हम समाजसेवियों से जितना हो सकता है ,वह तो हम करेंगे ही लेकिन आपसे भी उम्मीद करते हैं कि कचरा नहीं फेंक कर कुछ तो सहयोग दीजिए ताकि हम लोगों के प्रयास सार्थक हो सकें और एक बार फिर हमारी दूध नदी स्पष्ट रूप से ‘मातृस्वरूपा जीवन- रेखा’ बन सके।
