विनोद जैन
फूलों से लदा टेशु का वृक्ष आने वाले रंगों का त्यौहार फागुन की याद दिला देते हैं,, भारतीय तीज त्योहारो में प्रकृति भी अपनी अकल्पनीय छटा बिखेर कर बहुत ही बेसब्री से त्योहारों की प्रतीक्षा में रहते हैं, वैसे तो फागुन त्यौहार में पलाश के फूलों का एक अलग ही महत्व है,, बुजुर्गों से सुना है कि इसके फूलों से अतीत में रंग बनाकर होली खेला जाता था! अब तो बाजारों में अनेक प्रकार के रंग आ चुके हैं जिससे इस फूल की महत्ता कम हो चुकी है, देखा जाए तो अतीत में होली की शुरुआत महीने भर पहले से हो जाती थी, प्रत्येक गांव के चौपाल पर गांव के बड़े बुजुर्ग और युवा इकट्ठे होकर फाग की धुन पर नाचते और गाते थे, फागुन के रंग से शहर भी अछूता नहीं था,, अब धीरे-धीरे भारतीय त्योहारों की महत्ता भी कम होते जा रही है, अब पहले जैसे त्योहार के लिए तैयारी नहीं रहती लोग अपने आप को एडवांस दिखाने की चाह में रंगों से भी परहेज करने लग गए रही सही कसर प्रशासनिक अमला पूरी कर दे रही है, क्या साल में एक बार आने वाले त्योहार के लिए इतनी प्रशासनिक कसावट सही है, सिर्फ बोर्ड का पेपर है करके या कुछ और यदि संस्कृति ही नहीं रहेगी तो संस्कार कहां से ,,
