अभिनव अवस्थी

शनिवार को सुबह 10 बजे आठदाहरा के पास 500 से अधिक गांव के आदिवासी जुटे। अधिकांश लोगों के कांधे पर आंगा देव, हाथ में छड़ी व पूजा का अन्य सामान था। भास्कर की टीम इन आदिवासियों के साथ करीब 200 मीटर पैदल चलकर सुबह 11.30 बजे कारीपानी के पास सड़क किनारे पहुंचे, जहां पहल से आदिवासियों की खूब भीड़ थी। मुख्य पुजारी प्रफुल्ल ठाकुर द्वारा भंगाराव माई यानी न्यायाधीश के दरबार में पूजा-पाठ कर रहे थे।
जिस जगह यह पूजा-पाठ का सिलसिला चल रहा था, वहां भादो लगने के बाद पहला शनिवार को भंगाराव माई का दरबार लगाया जाता है, जहां आदिवासियों द्वारा जिन देवी देवताओं की पूरी आस्था के साथ पूजा-अर्चना की जाती है, उन्हीं देवी देवताओं को भक्तों की शिकायत पर कठोर सजा भी मिलती है। यहां न्यायाधीश के रूप में भंगाराम देवी सजा अधिकृत करती है। देवी देवताओं को यहां निलंबन, बर्खास्तगी, मान्यता समाप्ति से लेकर आजीवन कारावास की सजा दी जाती है। इस बार जातरा में करीब 8 देवी देवताओं को आरोप सिद्ध होने पर सजा के रूप जेल भेजा गया है। इन देवताओं पर आरोप है कि ये न तो ग्रामीणों की मन्नतें पूरी कर रहे हैं, न ही गांव में खुशहाली ला रहे हैं। ऐेसे देवी देवताओं को देवी भंगाराम ने अपनी अदालत में सजा सुनाई। करीब 6 घंटे में 150 पेशी हुई। सजा सुनाए गए देवी देवताओं को अलग-अलग समय के लिए मंदिर परिसर में बनी खुली जेल मे कैद कर लिया। जिन पर आरोप बेबुनियाद साबित हुए या जिनके खिलाफ कोई आरोप नहीं थे, वे जात्रा समाप्त होने के बाद ससम्मान अपने निवास स्थल लौट गए। यहां प्रतिनिधि के रूप पुजारी, गायता, सिरहा, ग्राम प्रमुख, मांझी मुखिया, पटेल उपस्थित रहते हैं।
महिलाओं का आना वर्जित
इस पूजा में 20 कोस बस्तर, 7 पाली ओडिशा, 16 परगन सिहावा के 500 से अधिक गांव के देवी-देवता शामिल हुए। परंपरानुसार भक्तों ने भंगाराम माई को अपनी समस्याएं बताई और वे शिकायतें भी की, जिनका निराकरण नहीं हो पा रहा था। साल में एक बार लगने वाले इस मेले में महिलाओं का आना वर्जित है। भंगाराम माई के अलावा काना पठान उर्फ डाक्टर देव, खिलौली देव, फॅडेयार बाबा आदि मौजूद थे। इस बार जात्रा विधान में 200 अांगादेव, डोली, छत्र, डांग के साथ देवी-देवता शामिल हुए।
गांव की हर विपदा के लिए देवी-देवता जिम्मेदार
आदिवासी समाज युवा प्रभार के संरक्षक व जिपं सदस्य मनोज साक्षी, गोड़वाना समाज के तहसील अध्यक्ष रामप्रसाद मरकाम ने बताया कि भंगाराव माई में भादो देवजात्रा की परपंरा आदिकाल (करीब 800 साल) से चल रही है। गांव में आई हर विपदा या कष्ट के लिए देवी-देवताओं को ही जिम्मेदार माना जाता है। ऐसे में न्यायाधीश भंगा राव माई उन्हें सजा सुनाती हैं। आरोपी पक्ष की ओर से दलील पेश करने के लिए सिरहा, पुजारी, गायता, माझी ग्राम के प्रमुख होते हैं। गांवों से आए शैतान, देवी और देवताओं की शिनाख्त की जाती है। इसके बाद आंगा, डोली, बैरंग के साथ लाए गए मुर्गी, बकरी, डांग को खाईनुमा गहरे गड्ढे के किनारे फेंक दिया जाता है। इसे ग्रामीण कारागार (जेल) कहते हैं।
