चंद्रहास वैष्णव 
छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा कही जाने वाली बिजली व्यवस्था आज खुद वेंटिलेटर पर नजर आ रही है। कल का ‘छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल’ (CSEB) जब आज की ‘पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी’ (CSPDCL) बना, तो प्रदेश की जनता को उम्मीद थी कि अब “कॉर्पोरेट कल्चर” आएगा, काम में तेजी आएगी और तकनीकी खामियां दूर होंगी। लेकिन हकीकत यह है कि सरकारी उपक्रम से सरकारी कंपनी बनने के इस सफर में सिर्फ अधिकारियों की सुख-सुविधाएं बढ़ीं, जनता के हिस्से में तो सिर्फ ‘अंधेरा’ ही आया है।
*पत्ता हिलते ही ‘गुल’: आधुनिकता का खोखला दावा*
आज आलम यह है कि चाहे चिलचिलाती गर्मी हो या मानसूनी बौछारें, हवा का एक झोंका भी बिजली विभाग के तंत्र को धराशायी करने के लिए काफी है। करोड़ों के मेंटेनेंस बजट और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के दावों के बीच, जरा सी आहट पर घंटों बिजली का गायब होना विभाग की कार्यक्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। जनता पूछ रही है—क्या यही वह ‘सुधार’ है जिसके लिए बोर्ड को कंपनी बनाया गया था?
*महलों में उजाला, झोपड़ियों में सन्नाटा*
संविधान में जनता को जनार्दन कहा गया है, लेकिन धरातल पर वह आज भी ‘नौकर’ जैसी स्थिति में है। विडंबना देखिए कि जिन नेताओं और मंत्रियों के एक इशारे पर विभाग नाचता है, उनके बंगलों में पलक झपकते ही बैकअप तैयार रहता है। वहां न वोल्टेज की समस्या है, न कटौती का दर्द। दूसरी ओर, वह आम नागरिक जो समय पर बिल भरता है, उसे समाधान शिविरों के नाम पर सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पिलाई जा रही है। ये शिविर अब समस्या निवारण के केंद्र कम और ‘जनता को बहलाने’ के इवेंट ज्यादा नजर आते हैं।
*सत्ता की चाकरी या जनता की सेवा?*
आरोप लग रहे हैं कि बिजली कंपनी के शीर्ष अधिकारी अपनी जवाबदेही जनता के प्रति भूलकर ‘सियासी आकाओं’ के आदेशों के गुलाम बन चुके हैं। व्यवस्था के इस निजीकरण और राजनीतिकरण का सीधा खामियाजा आम आदमी भुगत रहा है। बिजली विभाग अब सेवा भाव से नहीं, बल्कि सत्ता की सुविधा और कुछ चुनिंदा हाथों के मुनाफे के लिए काम करता दिख रहा है।
*”अधिकारी शायद भूल गए हैं कि कुर्सियां स्थायी नहीं होतीं। जब चुनाव का बिगुल बजेगा, तो वही ‘आका’ जनता के सामने नतमस्तक होंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या तब तक प्रदेश की जनता इसी तरह अंधेरे और अव्यवस्था का दंश झेलती रहेगी?”*
*कब टूटेगी बेशर्मी की दीवार?*
प्रदेश की जनता अब जुमलों और फाइलों में दर्ज ‘मेंटेनेंस’ के आंकड़ों से ऊब चुकी है। बिजली विभाग के कान तब तक नहीं खुलेंगे जब तक अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी। अगर व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में जनता का यह आक्रोश सड़कों पर उतरेगा, जिसे शांत करना किसी भी ‘आका’ के बस की बात नहीं होगी।
*यह एक गंभीर और संवेदनशील विषय है। बिजली की समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सीधे आम जनजीवन और अर्थव्यवस्था से जुड़ी होती है।*
